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Rahul
uski daulat se shanaasaai hai
uski daulat se shanaasaai hai | उसकी दौलत से शनासाई है
- Rahul
उसकी
दौलत
से
शनासाई
है
देर
से
बात
समझ
आई
है
तू
भी
चुपचाप
खड़ा
सुनता
है
यार
ये
तेरी
भी
रुस्वाई
है
देख
इक
तेरी
क़दर
के
हक़
में
लड़की
ने
कैसी
क़सम
खाई
है
- Rahul
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मेरा
क़ातिल
ही
मेरा
मुंसिफ़
है
क्या
मिरे
हक़
में
फ़ैसला
देगा
Sudarshan Fakir
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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डाली
है
ख़ुद
पे
ज़ुल्म
की
यूँँ
इक
मिसाल
और
उसके
बग़ैर
काट
दिया
एक
साल
और
Subhan Asad
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मुझको
बदन
नसीब
था
पर
रूह
के
बग़ैर
उसने
दिया
भी
फूल
तो
ख़ुशबू
निकाल
कर
Ankit Maurya
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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हमेशा
इक
दूसरे
के
हक़
में
दु'आ
करेंगे
ये
तय
हुआ
था
मिलें
या
बिछड़ें
मगर
तुम्हीं
से
वफ़ा
करेंगे
ये
तय
हुआ
था
Shabeena Adeeb
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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ये
मैंने
कब
कहा
कि
मेरे
हक़
में
फ़ैसला
करे
अगर
वो
मुझ
से
ख़ुश
नहीं
है
तो
मुझे
जुदा
करे
मैं
उसके
साथ
जिस
तरह
गुज़ारता
हूँ
ज़िंदगी
उसे
तो
चाहिए
कि
मेरा
शुक्रिया
अदा
करे
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Tehzeeb Hafi
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इस
ज़िन्दगी
में
इतनी
फ़राग़त
किसे
नसीब
इतना
न
याद
आ
कि
तुझे
भूल
जाएँ
हम
Ahmad Faraz
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तेरी
नफ़ासत
से
गुज़ारिश
है
मिरी
ऐसी
ही
तू
रहना
ये
ख़्वाहिश
है
मिरी
Rahul
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एक
दिन
तुम
खो
दोगी
मुझे
एक
दिन
तुमको
पा
लूँगा
मैं
Rahul
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इस
जहाँ
भर
में
मैं
किसको
जानता
हूँ
रब
ख़ुदा
भी
मैं
तुझे
ही
मानता
हूँ
आ
गया
तेरे
बुलाने
पर
यहाँ
मैं
बस
यहाँ
इक
शख़्स
को
पहचानता
हूँ
कोई
हिस्सा
तो
मिले
मुझको
ख़ुशी
का
इस
तरह
मैं
अपने
ग़म
को
छानता
हूँ
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Rahul
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ऐसा
पहले
तो
नहीं
होता
था
मैं
कभी
ग़म
में
नहीं
सोता
था
इस
तरह
जीना
सिखाया
सबने
शीशे
के
सामने
ही
रोता
था
कुछ
ख़तों
में
ये
लिखा
लड़के
ने
जो
नहीं
चाहे
वही
होता
था
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Rahul
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बंद
कमरे
में
अकेले
रोना
जिस्म
धरती
पे
बिछा
के
सोना
जब
कभी
याद
मिरी
आ
जाए
मेरे
कूचे
में
न
लम्हें
खोना
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Rahul
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