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ALI ZUHRI
kyun banaati ho mahal taash ka apne dil men
kyun banaati ho mahal taash ka apne dil men | क्यूँँ बनाती हो महल ताश का अपने दिल में
- ALI ZUHRI
क्यूँँ
बनाती
हो
महल
ताश
का
अपने
दिल
में
ज़िन्दगी
तो
हसीं
ख़्वाबों
से
जुदा
है
ज़ोहरा
- ALI ZUHRI
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ज़िंदगी
एक
फ़न
है
लम्हों
को
अपने
अंदाज़
से
गँवाने
का
Jaun Elia
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कितना
भी
दर्द
पिला
दे
ख़ुदा
पी
सकता
हूँ
ज़िन्दगी
हिज्र
से
भर
दे
मिरी
जी
सकता
हूँ
हर
दफ़ा
दिल
पे
ही
खा
के
हुई
है
आदत
ये
बंद
आँखों
से
भी
हर
ज़ख़्म
को
सी
सकता
हूँ
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Faiz Ahmad
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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यूँँ
ज़िंदगी
गुज़ार
रहा
हूँ
तिरे
बग़ैर
जैसे
कोई
गुनाह
किए
जा
रहा
हूँ
मैं
Jigar Moradabadi
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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हाल
मत
पूछो
हमारी
ज़िंदगी
का
एक
चलती-फिरती
सी
दीवार
है
बस
Rachit Sonkar
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वो
मेरी
ज़िन्दगी
का
आख़िरी
ग़म
था
उसी
ने
मुझको
ख़ुश
रहना
सिखाया
है
Sapna Moolchandani
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जुदा
हुए
हैं
बहुत
लोग
एक
तुम
भी
सही
अब
इतनी
बात
पे
क्या
ज़िंदगी
हराम
करें
Nasir Kazmi
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बता
रहा
है
झटकना
तेरी
कलाई
का
ज़रा
भी
रंज
नहीं
है
तुझे
जुदाई
का
मैं
ज़िंदगी
को
खुले
दिल
से
खर्च
करता
था
हिसाब
देना
पड़ा
मुझको
पाई-पाई
का
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Azhar Faragh
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बद-हवा
सेी
है
बे-ख़याली
है
क्या
ये
हालत
भी
कोई
हालत
है
ज़िंदगी
से
है
जंग
शाम-ओ-सहर
मौत
से
शिकवा
है
शिकायत
है
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Chandan Sharma
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जब
वो
अपने
कानों
में
झुमका
लटकाती
है
वो
लड़की
तो
बस
मेरा
दिल
ही
दहलाती
है
मैंने
जब
चाहा
कह
दूँ
उसको
अपनी
ख़्वाहिश
बातों
बातों
में
यह
बातें
भी
रह
जाती
है
वो
जब
भी
अपने
हाथों
से
मुझको
छूती
है
ये
दिल
थम
जाता
है
सासें
रुक
सी
जाती
है
मेरी
हसरत
थी
उसको
पाने
की
लेकिन
अब
वो
मेरे
ख़्वाबों
से
भी
रुख़्सत
हो
जाती
है
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ALI ZUHRI
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मेरी
तमाम
ज़िंदगी
बर्बाद
कर
के
अब
मसरूफ़
होगी
ईद
कि
तय्यारियों
में
वो
ALI ZUHRI
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फ़लसफ़ी
इश्क़
पे
लिखते
है
फ़साने
कितने
इस
समुंदर
में
हुए
ग़र्क़
ज़माने
कितने
शा'इरी
इश्क़
ख़ुदा
जाम
किताबें
औरत
एक
जीवन
को
बिताने
के
बहाने
कितने
कभी
स्कूल
कभी
गलियाँ
कभी
मय-ख़ाना
उम्र
के
साथ
बदलते
हैं
ठिकाने
कितने
एक
हफ़्ता
ही
जुदाई
का
सहा
जाता
नहीं
मौसम-ए-हिज्र
अभी
और
हैं
आने
कितने
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ALI ZUHRI
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बाद
तेरे
तो
क्या
करेंगे
हम
हिज्र
का
हक़
अदा
करेंगे
हम
फूल
बन
जाएँगे
महकने
को
तितलियों
से
वफा
करेंगे
हम
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ALI ZUHRI
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सर-ए-बाज़ार
मैं
उसकी
मोहब्बत
को
न
बेचूँगा
किसी
नाज़ुक
परी
के
जिस्म
से
कपड़ा
न
खेचूँगा
ALI ZUHRI
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