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Vishal Jha
kab tak ae yaar jungle ki baahen kaatega tu
kab tak ae yaar jungle ki baahen kaatega tu | कब तक ए यार, जंगल की बाहें काटेगा तू
- Vishal Jha
कब
तक
ए
यार,
जंगल
की
बाहें
काटेगा
तू
पर
खैर
तो
अभी,
मेरी
बातें
काटेगा
तू
तू
ने
शजर
में
बैठै,
टहनी
जो
काटी
है
ना
इक
दिन
उसी
के
सदके
में,
सांसें
काटेगा
तू
- Vishal Jha
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धूप
तो
धूप
ही
है
इसकी
शिकायत
कैसी
अब
की
बरसात
में
कुछ
पेड़
लगाना
साहब
Nida Fazli
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इक
मुहब्बत
से
भरी
उस
ज़िंदगी
के
ख़्वाब
हैं
पेड़
दरिया
और
पंछी
तेरे
मेरे
ख़्वाब
हैं
Neeraj Nainkwal
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इसी
से
जान
गया
मैं
कि
बख़्त
ढलने
लगे
मैं
थक
के
छाँव
में
बैठा
तो
पेड़
चलने
लगे
मैं
दे
रहा
था
सहारे
तो
इक
हुजूम
में
था
जो
गिर
पड़ा
तो
सभी
रास्ता
बदलने
लगे
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Farhat Abbas Shah
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हम
लोग
चूंकि
दश्त
के
पाले
हुए
हैं
सो
ख़्वाबों
में
चाहे
झील
हों,
आँखों
में
पेड़
हैं
Siddharth Saaz
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दरख़्त
काट
के
जब
थक
गया
लकड़हारा
तो
इक
दरख़्त
के
साए
में
जा
के
बैठ
गया
Zubair Ali Tabish
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आप
जिस
चीज़
को
कहते
हैं
कि
बेहोशी
है
वो
दिमाग़ों
में
ज़रा
देर
की
ख़ामोशी
है
सूखते
पेड़
से
पंछी
का
जुदा
हो
जाना
ख़ुद-परस्ती
नहीं
एहसान-फ़रामोशी
है
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Ashu Mishra
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इस
रास्ते
में
जब
कोई
साया
न
पाएगा
ये
आख़िरी
दरख़्त
बहुत
याद
आएगा
Azhar Inayati
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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वो
पेड़
जिस
की
छाँव
में
कटी
थी
उम्र
गाँव
में
मैं
चूम
चूम
थक
गया
मगर
ये
दिल
भरा
नहीं
Hammad Niyazi
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खड़े
होकर
कहा
ये
आइने
के
रु-बा-रु
मैंने
शजर
तुमको
कहीं
मिल
जाए
मुझको
इत्तिला
करना
Shajar Abbas
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रहेगा
जो
बन
के
कहानी
में
मेरा
वो
किरदार
ज़िंदा
रखूंगा
अबद
तक
Vishal Jha
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हिदायत
लगी
होती
उस
लड़की
पर
सो
पढ़ते
उसे
छूने
से
पहले
हम
Vishal Jha
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शिकस्ता
दिल
की
चाहत
कौन
करता
है
हमारे
घर
में
बरकत
कौन
करता
है
नहीं
है
हाफ़िज़े
का
हिस्सा
कोई
भी
हलक
में
बैठे
हरकत
कौन
करता
है
लगी
है
आग
मेरे
ग़म
को
बारिश
में
बुझाने
की
इजाज़त
कौन
करता
है
अगर
सब
कुछ
बता
दोगे
रखी
पिस्तौल
डरा
के
यूँंँ
हिफ़ाज़त
कौन
करता
है
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Vishal Jha
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सदाएँ
आती
जब
मुझको
भी
अंदर
से
ख़िज़ाँ
का
अक्स
हो
जाता
हूँ
बाहरस
हवा-ए-ग़म
अगर
हो
दाइमी
मुझ
पे
हरा
और
ताज़ा
हो
सकता
हूँ
पैकर
से
कमाई
है
मलाल-ओ-अश्क
हम
ने
तो
सो
बाग़-ए-हिज्र
ही
निकलेगा
लॉकर
से
जो
शाख-ए-लब
से
टूटेगा
समर
मेरा
अभी
लटका
हुआ
नज़रों
के
लंगर
से
वही
जो
याद
आना
था
नहीं
आया
मुसीबत
घूमती
सरगोश
नंबर
से
उगी
फसलें
फ़ना
तो
सब
ने
काटी
है
कभी
जीती
किसी
ने
शर्त
अंबर
से
तेरी
बस
तीन
से
तनक़ीद
करता
हूँ
मैं
पंखों
से
दिवारों
से
व
बिस्तर
से
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Vishal Jha
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हमारे
हाथ
में
आधा,
अगर
जो
चाँद
बनता
तो
मुहब्बत
की
कलाई
में,
मेरा
कंगन
भी
मिल
जाता
Vishal Jha
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