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Zubair Ali Tabish
darakht kaat ke jab thak gaya lakadhara
darakht kaat ke jab thak gaya lakadhara | दरख़्त काट के जब थक गया लकड़हारा
- Zubair Ali Tabish
दरख़्त
काट
के
जब
थक
गया
लकड़हारा
तो
इक
दरख़्त
के
साए
में
जा
के
बैठ
गया
- Zubair Ali Tabish
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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एक
साया
है
घने
पेड़
का
मेरे
सर
पर
एक
आँचल
से
मुझे
ठंडी
हवा
आती
है
Binte Reshma
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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तुमको
फ़िराक-ए-यार
ने
मिस्मार
कर
दिया
मुझको
फ़िराक-ए-यार
ने
फ़नकार
कर
दिया
गुल
से
मुतालिबा
जो
किया
बोसे
का
शजर
गुल
ने
हिला
के
पत्तियाँ
इनकार
कर
दिया
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Shajar Abbas
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धूप
तो
धूप
ही
है
इसकी
शिकायत
कैसी
अब
की
बरसात
में
कुछ
पेड़
लगाना
साहब
Nida Fazli
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ये
सोच
के
माँ
बाप
की
ख़िदमत
में
लगा
हूँ
इस
पेड़
का
साया
मिरे
बच्चों
को
मिलेगा
Munawwar Rana
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पेड़
का
दुख
तो
कोई
पूछने
वाला
ही
न
था
अपनी
ही
आग
में
जलता
हुआ
साया
देखा
Jameel Malik
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है
नार
दोस्तों
कसरत
से
मुंतज़िर
उनकी
ग़म-ए-हुसैन
में
जो
कारोबार
करते
हैं
ये
सब
हैं
गुलशन-ए-हैदर
के
गुल
शजर
ज़ैदी
ये
गुल
तब्बसुम-ए-लब
से
शिकार
करते
हैं
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Shajar Abbas
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ये
रंग
रंग
परिंदे
ही
हम
से
अच्छे
हैं
जो
इक
दरख़्त
पे
रहते
हैं
बेलियों
की
तरह
Khaqan Khavar
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हम
ख़ुश
हैं
हमें
धूप
विरासत
में
मिली
है
अजदाद
कहीं
पेड़
भी
कुछ
बो
गए
होते
Shahryar
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तुम्हें
इक
मश्वरा
दूँ
सादगी
से
कह
दो
दिल
की
बात
बहुत
तैयारियाँ
करने
में
गाड़ी
छूट
जाती
है
Zubair Ali Tabish
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मैं
क़िस्सा
मुख़्तसर
कर
के,
ज़रा
नीची
नज़र
कर
के
ये
कहता
हूँ
अभी
तुम
से,
मोहब्बत
हो
गई
तुम
से
Zubair Ali Tabish
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वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
Zubair Ali Tabish
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बस
एक
ही
दोस्त
है
दुनिया
में
अपना
मगर
उस
से
भी
झगड़ा
चल
रहा
है
Zubair Ali Tabish
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हमने
पर्चे
आँसुओं
से
भर
दिए
और
तुमने
इतने
कम
नंबर
दिए
ऊंचे
नीचे
घर
थे
बस्ती
में
बहुत
जलजले
ने
सब
बराबर
कर
दिए
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Zubair Ali Tabish
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