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Vineet Dehlvi
vahii saath dete hain aaKHir men
vahii saath dete hain aaKHir men | वही साथ देते हैं आख़िर में
- Vineet Dehlvi
वही
साथ
देते
हैं
आख़िर
में
जिन्हें
हम
पुकारा
नहीं
करते
- Vineet Dehlvi
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ये
ज़ुल्फ़
अगर
खुल
के
बिखर
जाए
तो
अच्छा
इस
रात
की
तक़दीर
सँवर
जाए
तो
अच्छा
जिस
तरह
से
थोड़ी
सी
तेरे
साथ
कटी
है
बाक़ी
भी
उसी
तरह
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
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Sahir Ludhianvi
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मुझे
अब
आइनों
की
क्या
ज़रूरत
मैं
अपने
साथ
अब
रहने
लगा
हूँ
Madan Mohan Danish
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अब
मज़ीद
उस
सेे
ये
रिश्ता
नहीं
रक्खा
जाता
जिस
सेे
इक
शख़्स
का
पर्दा
नहीं
रक्खा
जाता
पढ़ने
जाता
हूँ
तो
तस्में
नहीं
बाँधे
जाते
घर
पलटता
हूँ
तो
बस्ता
नहीं
रक्खा
जाता
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Tehzeeb Hafi
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शर्तें
लगाई
जाती
नहीं
दोस्ती
के
साथ
कीजे
मुझे
क़ुबूल
मिरी
हर
कमी
के
साथ
Waseem Barelvi
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जो
मेरे
साथ
मोहब्बत
में
हुई
आदमी
एक
दफा
सोचेगा
रात
इस
डर
में
गुजारी
हमने
कोई
देखेगा
तो
क्या
सोचेगा
Tehzeeb Hafi
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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कितनी
मुश्किल
के
बाद
टूटा
है
एक
रिश्ता
कभी
जो
था
ही
नहीं
Shahbaz Rizvi
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किसी
ने
ख़्वाब
में
आकर
मुझे
ये
हुक्म
दिया
तुम
अपने
अश्क
भी
भेजा
करो
दु'आओं
के
साथ
Afzal Khan
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सगी
बहनों
का
जो
रिश्ता
रिश्ता
है
उर्दू
और
हिन्दी
में
कहीं
दुनिया
की
दो
ज़िंदा
ज़बानों
में
नहीं
मिलता
Munawwar Rana
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बात
करते
हुए
बे-ख़याली
में
ज़ुल्फ़ें
खुली
छोड़
दी
हम
निहत्थों
पे
उसने
ये
कैसी
बलाएँ
खुली
छोड़
दी
साथ
जब
तक
रहे
एक
लम्हे
को
भी
रब्त
टूटा
नहीं
उसने
आँखें
अगर
बंद
कर
ली
तो
बाँहें
खुले
छोड़
दी
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Khurram Afaq
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तमाम
रस्ते
जाते
हैं
तेरे
घर
की
ओर
पर
कोई
रस्ता
तेरी
ओर
नहीं
जाता
Vineet Dehlvi
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सादगी
देख
के
हुए
पागल
सादगी
देख
के
मोहब्बत
की
सादगी
ने
ही
फिर
फँसाया
हमें
सादगी
ने
ही
फिर
हिफ़ाज़त
की
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Vineet Dehlvi
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अब
भला
क्यूँँ
चुप
रहें
हम
दर्द
और
कितना
सहें
हम
चार
दिन
की
दिल-लगी
को
अब
मोहब्बत
क्यूँँं
कहें
हम
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Vineet Dehlvi
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निकले
गर
होंठों
से
तो
क्या
फ़ाइदा
आह
दिल
से
भी
निकलनी
चाहिए
Vineet Dehlvi
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जंग
में
हाथ
रोक
लेते
हैं
लब
पे
हर
बात
रोक
लेते
हैं
करने
को
कर
लें
हम
भी
इश्क़
मगर
घर
के
हालात
रोक
लेते
हैं
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Vineet Dehlvi
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