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Abhishek Shukla
main kahunga to shahar ye tumse poochhega zaroor
main kahunga to shahar ye tumse poochhega zaroor | मैं कहूँगा तो शहर ये तुम सेे पूछेगा ज़रूर
- Abhishek Shukla
मैं
कहूँगा
तो
शहर
ये
तुम
सेे
पूछेगा
ज़रूर
मैं
तुम्हारे
हक़
में
ज़्यादा
बोल
भी
सकता
नहीं
- Abhishek Shukla
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कुछ
रिश्तों
में
दिल
को
आज़ादी
नइँ
होती
कुछ
कमरों
में
रौशनदान
नहीं
होता
है
Vikram Gaur Vairagi
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इस
ज़माने
में
भी
इक
लड़का
तुम्हें
यूँँ
चाहता
है
अपने
रब
से
वो
तुम्हारी
जैसी
बेटी
माँगता
है
तुम
भला
उस
प्रेम
की
गहराई
क्या
समझोगे
जानाँ
जो
कभी
ख़्वाबों
में
भी
अपनी
न
सरहद
लाँघता
है
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Harsh saxena
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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दोस्त
अपना
हक़
अदा
करने
लगे
बेवफ़ाई
हमनवा
करने
लगे
मेरे
घर
से
एक
चिंगारी
उठी
पेड़
पत्ते
सब
हवा
करने
लगे
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Santosh S Singh
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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निगाह-ए-गर्म
क्रिसमस
में
भी
रही
हम
पर
हमारे
हक़
में
दिसम्बर
भी
माह-ए-जून
हुआ
Akbar Allahabadi
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हर
गाम
तेरे
इश्क़
का
इकरार
है
मैं
हूँ
ज़ंजीर
है
ज़ंजीर
की
झनकार
है
मैं
हूँ
ऐ
ज़ीस्त
जो
सब
सेे
बड़ी
फ़नकार
है
तू
है
और
तुझ
सेे
बड़ा
वो
जो
अदाकार
है
मैं
हूँ
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Obaid Azam Azmi
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बहुत
बर्बाद
हैं
लेकिन
सदा-ए-इंक़लाब
आए
वहीं
से
वो
पुकार
उठेगा
जो
ज़र्रा
जहाँ
होगा
Ali Sardar Jafri
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ओ
सखी
मन
उसका
तो
तन
भी
उसी
का
हक़
है
उसको
ग़ैर
ये
आँगन
न
चू
में
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Neeraj Neer
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यूँँ
ही
थोड़ी
मेरी
गज़लों
में
इतना
दुख
होता
है
इस
दुनिया
ने
हम
लड़कों
से
रोने
का
हक़
छीना
है
Harsh saxena
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इतनी
नफ़रत
इक
दूजे
से
करते
हैं
हम
दोनों
में
यार
मोहब्बत
होनी
थी
Abhishek Shukla
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नहीं
है
वो
मेरी
क़िस्मत
में
हाँ
ये
जानता
हूँ
मैं
नशे
में
भी
रहूँ
तब
भी
उसे
पहचानता
हूँ
मैं
नहीं
मैं
मानता
कि
इश्क़
में
शामिल
रहें
दो
जिस्म
किसी
का
रात
भर
रोना
मोहब्बत
मानता
हूँ
मैं
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Abhishek Shukla
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इक
दरिया
है
बहता
बहता
और
समुंदर
गहरा
है
उसकी
आँखों
में
जितना
है
सारा
मंज़र
गहरा
है
इतनी
जल्दी
भर
जाएगा
ये
ऐसा
भी
ज़ख़्म
नहीं
बड़ी
तसल्ली
से
मारा
है
उसने
ख़ंजर
गहरा
है
यूँँ
हँसने
से
क्या
होता
है,
आँखों
को
देखा
कीजे
बाहर
जो
जितना
छिछला
है
उतना
अंदर
गहरा
है
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Abhishek Shukla
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न
बहें
तो
क्या
करें
फिर
आप
ही
कहिए
ज़रा
आप
सागर
से
नदी
का
फासला
तो
देखिये
Abhishek Shukla
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