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Shivangi Shivi
man apna man maani hai
man apna man maani hai | मन अपना मन मानी है
- Shivangi Shivi
मन
अपना
मन
मानी
है
काहे
की
हैरानी
है
काग़ज़
की
ये
कश्ती
है
स्याही
का
ये
पानी
है
आँखों
में
गहराई
है
हरकत
इक
नादानी
है
देखी
जो
बरसों
पहले
सूरत
ये
पहचानी
है
प्यार
नहीं
सस्ता
होता
ये
तो
अमर
रूहानी
है
बिंदी
उसकी
सुंदर
है
पत्थर
की
पेशानी
है
चाँद
में
जिसको
देखा
है
चेहरा
वो
नूरानी
है
- Shivangi Shivi
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बस
टूटी
कश्ती
ही
बतला
सकती
है
इक
दरिया
की
कितनी
शक्लें
होती
हैं
Soubhari Deepesh Sharma
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मैं
अपनी
मौत
से
ख़ल्वत
में
मिलना
चाहता
हूँ
सो
मेरी
नाव
में
बस
मैं
हूँ
नाख़ुदा
नहीं
है
Pallav Mishra
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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ख़मोश
झील
के
पानी
में
वो
उदासी
थी
कि
दिल
भी
डूब
गया
रात
माहताब
के
साथ
Rehman Faris
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कितना
महफ़ूज़
हूँ
मैं
कोने
में
कोई
अड़चन
नहीं
है
रोने
में
मैंने
उसको
बचा
लिया
वरना
डूब
जाता
मुझे
डुबोने
में
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Fahmi Badayuni
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किसी
ने
कहा
था
टूटी
हुई
नाव
में
चलो
दरिया
के
साथ
आप
की
रंजिश
फ़ुज़ूल
है
Shahid Zaki
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मुक़ाबिल
फ़ासलों
से
ही
मोहब्बत
डूब
जाएगी
सुनोगी
झूठी
बातें
तुम
हक़ीक़त
डूब
जाएगी
चलेगी
तब
तलक
जब
तक
तिरी
परछाईं
देखेगी
तिरा
जब
हुस्न
देखेगी
सियासत
डूब
जाएगी
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Anurag Pandey
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वो
जो
प्यासा
लगता
था
सैलाब-ज़दा
था
पानी
पानी
कहते
कहते
डूब
गया
है
Aanis Moin
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जब
अपना
दिल
ख़ुद
ले
डूबे
औरों
पे
सहारा
कौन
करे
कश्ती
पे
भरोसा
जब
न
रहा
तिनकों
पे
भरोसा
कौन
करे
Anand Narayan Mulla
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पुरानी
कश्ती
को
पार
लेकर
फ़क़त
हमारा
हुनर
गया
है
नए
खेवइये
कहीं
न
समझें
नदी
का
पानी
उतर
गया
है
Uday Pratap Singh
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आँखों
से
ये
कहना
है
बरसातें
अब
बंद
करो
Shivangi Shivi
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तिरा
ज़माना
मुझको
करता
है
बदनाम
ख़ुदा
लगता
है
तू
भी
इनकी
साजिश
में
शामिल
है
Shivangi Shivi
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इतनी
आग
जलाए
हैं
पत्थर
भी
पिघलाए
हैं
तारे
क्या
आसमान
से
हम
चाँद
तोड़
लाए
हैं
इन
आँखों
में
देखो
तो
कितने
ख़्वाब
समाए
हैं
दिल
के
दरीचे
पे
हमने
थोड़े
दिए
जलाए
हैं
इन
काँटों
की
राहों
में
हमने
फूल
बिछाए
हैं
ख़्वाबों
की
ताबीरों
को
पलकों
तले
छुपाए
हैं
इस
दिल
के
इक
कोने
में
कितने
दर्द
छुपाए
हैं
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Shivangi Shivi
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मस्ती
में
बहता
दरिया
हूँ
अंबर
मुझको
देखा
करता
Shivangi Shivi
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सूरज
कस
के
जलता
है
पत्थर
रोज़
पिघलता
है
सूख
गया
दरिया
सारा
मौसम
रोज़
बदलता
है
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Shivangi Shivi
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