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Asad Khan
lad padenge log so baatein fasaa
lad padenge log so baatein fasaa | लड़ पड़ेंगे लोग सो बातें फ़सादी नइॅं करूँँगा
- Asad Khan
लड़
पड़ेंगे
लोग
सो
बातें
फ़सादी
नइॅं
करूँँगा
इस
ख़राबे
में
ज़ियादा
और
ख़राबी
नइॅं
करूँँगा
- Asad Khan
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क़ब्रों
में
नहीं
हम
को
किताबों
में
उतारो
हम
लोग
मोहब्बत
की
कहानी
में
मरे
हैं
Ajaz tawakkal
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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कैसे
मंज़र
सामने
आने
लगे
हैं
गाते
गाते
लोग
चिल्लाने
लगे
हैं
Dushyant Kumar
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शरीफ़
इंसान
आख़िर
क्यूँ
इलेक्शन
हार
जाता
है
किताबों
में
तो
ये
लिक्खा
था
रावन
हार
जाता
है
Munawwar Rana
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समझ
से
काम
जो
लेता
हर
एक
बशर
'ताबाँ'
न
हाहा-कार
ही
मचते
न
घर
जला
करते
Anwar Taban
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मिरे
किरदार
जाने
दे
नज़रअंदाज
कर
दे
ख़ुदा
की
फ़िल्म
है
ये
आदमी
से
क्या
शिकायत
Vikram Sharma
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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इंसाँ
की
ख़्वाहिशों
की
कोई
इंतिहा
नहीं
दो
गज़
ज़मीं
भी
चाहिए
दो
गज़
कफ़न
के
बाद
Kaifi Azmi
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जिस
ने
इस
दौर
के
इंसान
किए
हैं
पैदा
वही
मेरा
भी
ख़ुदा
हो
मुझे
मंज़ूर
नहीं
Hafeez Jalandhari
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इश्क़
क़ैस
फ़रहाद
रोमियो
जैसे
ही
कर
सकते
हैं
हम
तो
ठहरे
दस
से
छह
तक
ऑफ़िस
जाने
वाले
लोग
Vashu Pandey
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अपनी
दीद
की
कुछ
यूँँ
तासीर
भेजी
है
लिबास-ए-ईद
में
उसने
तस्वीर
भेजी
है
Asad Khan
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सब
शुरू
में
हम
सेे
अच्छा
बोलते
हैं
बेसबब
फिर
उल्टा
सीधा
बोलते
हैं
रात
जंगल
में
गुज़ारी
तो
ये
पाया,
पेड़
इक
दूजे
से
कितना
बोलते
हैं
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Asad Khan
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फूल
पर
मानो
तितलियाँ
नहीं
हैं
जिसके
भी
घर
में
बेटियाँ
नहीं
हैं
ज़िंदगी
ऐसी
खेल
है
जिस
में
साँप
हैं
और
सीढ़ियाँ
नहीं
हैं
मुझको
बारिश
अज़ीज़
है
यारों
यूँँॅं
ही
कहता
हूॅं
छतरियाँ
नहीं
हैं
उसको
बच्चों
के
साथ
देखा
था
उसके
हाथों
में
चूड़ियाँ
नहीं
हैं
मेरे
इक
बोसे
से
खुलेगी
वो
उस
तिजोरी
की
चाबियाँ
नहीं
हैं
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Asad Khan
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तुम्हें
लगता
है
तेज़ी
हो
रही
है
हमारी
उम्र
छोटी
हो
रही
है
वहाॅं
पे
कोई
फाॅंसी
खा
रहा
है
वहाॅं
पे
कोई
शादी
हो
रही
है
ख़यालों
की
ही
वेकेंसी
न
आई
कई
शे'रों
की
भर्ती
हो
रही
है
हमें
सपने
दिखाए
जा
रहे
हैं
किसी
की
नींद
पूरी
हो
रही
है
हमारा
जिस्म
सूखा
पड़
रहा
है
हमारी
रूह
प्यासी
हो
रही
है
गया
वो
छोड़
के
क़िस्सा
करो
ख़त्म
असद
दफ़्तर
में
देरी
हो
रही
है
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Asad Khan
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चल
पड़ा
था
मैं
इक
परी
की
तरफ़
फिर
नहीं
लौटा
रोशनी
की
तरफ़
मेरी
ये
ज़ब्त
करने
की
आदत
मुझको
ले
आई
शा'इरी
की
तरफ़
दुख
में
याद
आती
है
उसी
की
मुझे
कितने
रस्ते
हैं
इक
गली
की
तरफ़
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Asad Khan
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