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Asad Khan
sab shuroo men hamse achha bolte hain
sab shuroo men hamse achha bolte hain | सब शुरू में हम सेे अच्छा बोलते हैं
- Asad Khan
सब
शुरू
में
हम
सेे
अच्छा
बोलते
हैं
बेसबब
फिर
उल्टा
सीधा
बोलते
हैं
रात
जंगल
में
गुज़ारी
तो
ये
पाया,
पेड़
इक
दूजे
से
कितना
बोलते
हैं
- Asad Khan
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अभी
हमको
मुनासिब
आप
होते
से
नहीं
लगते
ब–चश्म–ए–तर
मुख़ातिब
हैं
प
रोते
से
नहीं
लगते
वही
दर्या
बहुत
गहरा
वही
तैराक
हम
अच्छे
हुआ
है
दफ़्न
मोती
अब
कि
गोते
से
नहीं
लगते
ये
आई
रात
आँखों
को
चलो
खूँ–खूँ
किया
जाए
बदन
ये
सो
भी
जाए
आँख
सोते
से
नहीं
लगते
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
ख़ाक
करेंगे
Asad Akbarabadi
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रात
भर
उन
का
तसव्वुर
दिल
को
तड़पाता
रहा
एक
नक़्शा
सामने
आता
रहा
जाता
रहा
Akhtar Shirani
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बिगड़
गई
थी
जो
दुनिया
सॅंवार
दी
हमने
चढ़ा
के
सर
पे
मुहब्बत
उतार
दी
हमने
अँधेरी
रात
किसी
बे-वफ़ा
की
यादों
में
बहुत
तवील
थी
लेकिन
गुज़ार
दी
हमने
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Hameed Sarwar Bahraichi
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आज
की
रात
दिवाली
है
दिए
रौशन
हैं
आज
की
रात
ये
लगता
है
मैं
सो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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कब
ठहरेगा
दर्द
ऐ
दिल
कब
रात
बसर
होगी
सुनते
थे
वो
आएँगे
सुनते
थे
सहर
होगी
Faiz Ahmad Faiz
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वैसे
तो
उम्र
थी
पढ़ाई
की
ख़ैर
हम
ने
ग़ज़ल
सराई
की
Asad Khan
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मेरे
दिल
का
बिखरा
हुआ
हाल
मुझको
हर
इक
रोज़
करता
है
पामाल
मुझको
तेरे
साथ
फिर
से
बिताने
हैं
वो
पल
तेरे
साथ
तस्वीर
में
डाल
मुझको
वो
इतना
हसीं
था
उसे
भूलने
में
लगेंगे
कम-अज़-कम
भी
दस
साल
मुझको
नहीं
जानता
अपने
आमाल
को
मैं
मगर
जानते
हैं
ये
आमाल
मुझको
किसी
ने
गले
से
लगा
रक्खा
था
और
किसी
ने
तो
दी
अपनी
ही
शॉल
मुझको
जहाँ
से
मेरे
ज़ख़्म
भरने
लगे
थे
वहीं
से
किया
उसने
पामाल
मुझको
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Asad Khan
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रस्ते
में
आने
वाली
ठोकर
बना
दिया
है
इस
ज़िंदगी
ने
मुझको
पत्थर
बना
दिया
है
उसने
कहा
के
ख़्वाहिश
ज़ाहिर
करो
सो
मैंने
उसकी
जबीं
को
चूमा
और
घर
बना
दिया
है
मैंने
तो
धूप
से
डर
के
थामा
था
शजर
को
हालात
ने
उसी
का
शौहर
बना
दिया
है
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Asad Khan
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इस
जवानी
का
फ़साना
भूल
जाऊॅं
ज़ख़्मी
हूॅं
तो
दिल
लगाना
भूल
जाऊॅं
यानी
तुझको
याद
करना
बंद
कर
दूॅं
यानी
मेरी
जाँ
मैं
खाना
भूल
जाऊॅं
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Asad Khan
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बीत
जाऊँगा
मैं
तो
लम्हा
हूँ
फिर
न
आऊँगा
चाहे
जैसा
हूँ
वक़्त
से
मेरी
रेस
लग
गई
थी
मैं
उसे
पीछे
छोड़
आया
हूँ
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Asad Khan
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