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Dipanshu Shams
na sar pe pallu na ladki hijaab maange hai
na sar pe pallu na ladki hijaab maange hai | न सर पे पल्लू न लड़की हिजाब माँगे है
- Dipanshu Shams
न
सर
पे
पल्लू
न
लड़की
हिजाब
माँगे
है
ये
अच्छे
कल
के
लिए
बस
किताब
माँगे
है
- Dipanshu Shams
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न
तेरे
आने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
न
दिल
लगाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
क़सम
ख़ुदा
की
बताता
हूँ
राज़
ये
तुमको
नहारी
खाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
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Paplu Lucknawi
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क्यूँँ
इक
तरफ़
निगाह
जमाए
हुए
हो
तुम
क्या
राज़
है
जो
मुझ
से
छुपाए
हुए
हो
तुम
Shakeel Badayuni
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सब
ने
माना
मरने
वाला
दहशत-गर्द
और
क़ातिल
था
माँ
ने
फिर
भी
क़ब्र
पे
उस
की
राज-दुलारा
लिक्खा
था
Ahmad Salman
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पहले
तो
मेरी
याद
से
आई
हया
उन्हें
फिर
आइने
में
चूम
लिया
अपने-आप
को
Shakeb Jalali
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रुख़्सार
पर
है
रंग-ए-हया
का
फ़रोग़
आज
बोसे
का
नाम
मैं
ने
लिया
वो
निखर
गए
Hakim Mohammad Ajmal Khan Shaida
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इतनी
जल्दी
न
गिरा
अपने
हसीं
रुख़
पे
नक़ाब
तू
मुझे
ठीक
से
हैरान
तो
हो
लेने
दे
Rajesh Reddy
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लिपट
भी
जा
न
रुक
'अकबर'
ग़ज़ब
की
ब्यूटी
है
नहीं
नहीं
पे
न
जा
ये
हया
की
ड्यूटी
है
Akbar Allahabadi
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सभी
से
राज़
कह
देता
हूँ
अपने
न
जाने
क्या
छुपाना
चाहता
हूँ
Shariq Kaifi
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तू
इस
तरह
से
मिला
फिर
मलाल
भी
न
रहा
तेरे
ख़याल
में
अपना
ख़याल
भी
न
रहा
कुछ
इस
अदास
झुकी
थी
हया
से
आँख
तेरी
हमारी
आँख
में
कोई
सवाल
भी
न
रहा
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Subhan Asad
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चुप
रहते
हैं
चुप
रहने
दो
राज़
बताओ
खोले
क्या
बात
वफ़ा
की
तुम
करती
हो
बोलो
हम
कुछ
बोले
क्या
उल्फ़त
तो
अफ़साना
है
तुम
करती
खूब
सियासत
हो
हम
भी
हैं
मक़बूल
बहुत
अब
बोल
किसी
के
होलें
क्या
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Anand Raj Singh
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इश्क़
बहरा
हो
गया
एक
शक
की
गूँज
से
Dipanshu Shams
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मैं
मुहाजिर
हूँ
ये
कहता
जा
रहा
है
शाख़
से
उड़कर
परिंदा
जा
रहा
है
इश्क़
क्या
है
कोई
पूँछे
यार
उस
सेे
खुद
ख़ुशी
करने
जो
लड़का
जा
रहा
है
आ
गई
मंज़िल
नज़र
लगता
है
उसको
जो
मुसाफ़िर
मुस्कुराता
जा
रहा
है
बूढ़े
घुटनों
को
ज़रूरत
धूप
की
है
और
सूरज
है
कि
छुपता
जा
रहा
है
मैं
यक़ीं
कैसे
करूँँ
उस
आदमी
का
जो
बनारस
कहके
शिमला
जा
रहा
है
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Dipanshu Shams
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दिखा
दिखा
के
बदन
शोहरतें
मिली
हैं
जिन्हें
बता
रहे
हैं
मआनी
लिबास
का
हम
को
Dipanshu Shams
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एक
ही
शय
फ़क़त
नज़र
ढूॅंढे
आदमियत
भरा
बशर
ढूॅंढे
पत्ते-पत्ते
में
प्यार
हो
जिसके
दिल
का
पंछी
वही
शजर
ढूॅंढे
फ़न
है
उसकी
ज़बान
में
और
वो
नासमझ
हाथ
में
हुनर
ढूॅंढे
ख़ुद
में
ही
तू
तो
एक
लावा
है
आग
फिर
क्यूँँ
इधर
उधर
ढूॅंढे
मंज़िलों
तक
नहीं
पहुँचता
वो
सिर्फ़
आसान
जो
डगर
ढूॅंढे
हाँ
ख़ुदा
भी
दिखेगा
तब
तुझको
अपने
माँ-बाप
में
अगर
ढूॅंढे
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Dipanshu Shams
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चाँद-तारे,
फ़िज़ा-धनक
देखूँ
सब
में
महबूब
की
झलक
देखूँ
शोख़
नज़रें
हसीं
बदन
है
मगर
सिर्फ़
तस्वीर
कब
तलक
देखूँ
दो
मुझे
तितलियाँ
सी
लगती
हैं
जब
झपकती
तिरी
पलक
देखूँ
बज़्म
में
लाख़
हों
सितारे
पर
मैं
फ़क़त
अपने
की
चमक
देखूँ
याद-ए-कूचा-ए-यार
आती
है
जब
कभी
फिल्म
मैं
'धड़क'
देखूँ
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Dipanshu Shams
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