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Dipanshu Shams
meri har ek mushkil men najoomi kii tarah akshar
meri har ek mushkil men najoomi kii tarah akshar | मेरी हर एक मुश्किल में नजूमी की तरह अक्सर
- Dipanshu Shams
मेरी
हर
एक
मुश्किल
में
नजूमी
की
तरह
अक्सर
परेशाँ
क्यूँँ
है
माथा
देखकर
पूछा
है
वालिद
ने
- Dipanshu Shams
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दबा
न
पाया
ये
इत्र
तक
भी
तेरे
बदन
की
महक
को
यारा
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एक
ही
शय
फ़क़त
नज़र
ढूॅंढे
आदमियत
भरा
बशर
ढूॅंढे
पत्ते-पत्ते
में
प्यार
हो
जिसके
दिल
का
पंछी
वही
शजर
ढूॅंढे
फ़न
है
उसकी
ज़बान
में
और
वो
नासमझ
हाथ
में
हुनर
ढूॅंढे
ख़ुद
में
ही
तू
तो
एक
लावा
है
आग
फिर
क्यूँँ
इधर
उधर
ढूॅंढे
मंज़िलों
तक
नहीं
पहुँचता
वो
सिर्फ़
आसान
जो
डगर
ढूॅंढे
हाँ
ख़ुदा
भी
दिखेगा
तब
तुझको
अपने
माँ-बाप
में
अगर
ढूॅंढे
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Dipanshu Shams
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क्यूँँ
लिखा
बद-नसीब
क़िस्मत
में
बीते
दिन-रात
इस
शिकायत
में
सिर्फ़
ख़ुद
को
ग़लत
न
समझे
आप
भूल
होती
है
सब
से
उजलत
में
यूँँ
मगन
हूँ
मैं
सोच
में
उसकी
जैसे
मज़दूर
कोई
मेहनत
में
राम
सीता
ने
लाज
रक्खी
बस
हम
से
क्या
हो
सका
मुहब्बत
में
ज़ख़्म
के
दर्द
से
ज़ियादा
दर्द
हम
ने
झेला
है
राह-ए-उल्फ़त
में
रोज़
कहता
है
फ़ालतू
इक
बात
कल
करूँँगा
ये
काम
फ़ुर्सत
में
रह
न
पाना
किसी
के
बिन
रहना
फ़र्क़
इतना
है
लत
और
आदत
में
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Dipanshu Shams
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सिगरेट
पीं
हज़ार
बहुत
मयकशी
हुई
बर्बाद
अच्छी
ख़ासी
मियाँ
ज़िन्दगी
हुई
वैसा
किया
था
काम
कि
जैसा
पड़ा
था
नाम
आवारा
कह
रहे
थे
सो
आवारगी
हुई
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Dipanshu Shams
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धूप
बादल
बारिशों
के
दरमियाँ
रब्त
है
इक
मौसमों
के
दरमियाँ
सौ
मआनी
इश्क़
के
खुलने
लगे
बैठा
जब
मैं
आशिक़ों
के
दरमियाँ
सिर्फ़
हम
दोनों
नज़र
आएँगे!
जान
देखो
आ
कर
चाहतों
के
दरमियाँ
ज़ब्त
आख़िर
कब
तलक
करता
भला
रो
पड़ा
वो
कहकहों
के
दरमियाँ
दिल
सुकूँ
की
जुस्तजू
करता
है
रोज़
ज़ीस्त
के
इन
मसअलों
के
दरमियाँ
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Dipanshu Shams
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