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Dipanshu Shams
kyun likha bad-naseeb qismat men
kyun likha bad-naseeb qismat men | क्यूँँ लिखा बद-नसीब क़िस्मत में
- Dipanshu Shams
क्यूँँ
लिखा
बद-नसीब
क़िस्मत
में
बीते
दिन-रात
इस
शिकायत
में
सिर्फ़
ख़ुद
को
ग़लत
न
समझे
आप
भूल
होती
है
सब
से
उजलत
में
यूँँ
मगन
हूँ
मैं
सोच
में
उसकी
जैसे
मज़दूर
कोई
मेहनत
में
राम
सीता
ने
लाज
रक्खी
बस
हम
से
क्या
हो
सका
मुहब्बत
में
ज़ख़्म
के
दर्द
से
ज़ियादा
दर्द
हम
ने
झेला
है
राह-ए-उल्फ़त
में
रोज़
कहता
है
फ़ालतू
इक
बात
कल
करूँँगा
ये
काम
फ़ुर्सत
में
रह
न
पाना
किसी
के
बिन
रहना
फ़र्क़
इतना
है
लत
और
आदत
में
- Dipanshu Shams
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हर
साल
इंतिज़ार
मुलाक़ात
का
हुआ
हर
साल
मिल
न
पाए
दिसबंर
से
जनवरी
Dipanshu Shams
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यूँँ
न
बे-मतलब
बढ़ा
बे-बात
का
रंग
है
हसीं
इक
दूसरे
के
साथ
का
रंग
यार
मेरे
कर
पहल
तू
दोस्ती
की
फिर
चढ़ेगा
ही
नहीं
उत्पात
का
रंग
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Dipanshu Shams
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न
आऊँगा
मैं
तेरे
ख़्वाब
में
कभी
भी
अब
वो
रोज़
ख़्वाब
में
आ
के
ये
वा'दा
करता
है
Dipanshu Shams
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ग़लत
को
ग़लत
कहना
प्यारे
यही
आज
सब
से
ग़लत
है
Dipanshu Shams
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हूँ
तेरी
साँसों
की
दरकार
राएगाँ
न
समझ
दरख़्त
मैं
हूँ
हवा-दार
राएगाँ
न
समझ
न
ऊब
दोस्त
सुकूँ
की
लुका-छुपी
से
अभी
है
खेल
ख़ूब
मज़ेदार
राएगाँ
न
समझ
जुनून-ए-इश्क़
को
समझे
है
राएगाँ
दुनिया
ख़ुदारा
तू
तो
मेरे
यार
राएगाँ
न
समझ
क़ुसूर-वार
हैं
हम
ग़लतियाँ
हमारी
थीं
तू
ख़ुद
को
बीच
की
दीवार
राएगाँ
न
समझ
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Dipanshu Shams
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