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Dipanshu Shams
galat ko galat kehna pyaare
galat ko galat kehna pyaare | ग़लत को ग़लत कहना प्यारे
- Dipanshu Shams
ग़लत
को
ग़लत
कहना
प्यारे
यही
आज
सब
से
ग़लत
है
- Dipanshu Shams
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दर्द
से
यूँँ
लगाव
रखता
हूँ
ताज़ा
हर
दम
मैं
घाव
रखता
हूँ
पार
करने
को
ज़ीस्त
का
दरिया
चलती
साँसों
की
नाव
रखता
हूँ
इक
तराज़ू
हूँ
मैं
सदाक़त
का
सच
की
जानिब
झुकाव
रखता
हूँ
उम्र
की
धूप
रूह
पर
न
पड़े
सो
बदन
का
ढकाव
रखता
हूँ
इक
क़लमकार
हूँ
तो
ज़ेहन
में
बस
फ़िक्र-ओ-फ़न
का
जमाव
रखता
हूँ
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Dipanshu Shams
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तमाशे
के
लिए
उसको
फ़क़त
इंसाँ
जुटाने
हैं
मदारी
जानता
है
ये
ज़माना
पागलों
का
है
Dipanshu Shams
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राज
दुनिया
पे
चले
मेरा
ये
कहने
वाला
आदमी
रहता
है
दुनिया
के
किसी
कोने
में
Dipanshu Shams
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न
आऊँगा
मैं
तेरे
ख़्वाब
में
कभी
भी
अब
वो
रोज़
ख़्वाब
में
आ
के
ये
वा'दा
करता
है
Dipanshu Shams
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अजनबी
राह
पर
खड़ा
हूँ
मैं
इसका
मतलब
भटक
गया
हूँ
मैं
रेड-बुल
सी
ही
फुर्ती
मिलती
है
उसके
जब
होठ
चूमता
हूँ
मैं
हिज्र
के
बाद
रोते-रोते
अब
बे-सबब
हँसने
भी
लगा
हूँ
मैं
ख़्वाहिशों
वस्ल
की
हैँ
मुझको
और
हिज्र
पर
शे'र
कह
रहा
हूँ
मैं
एक-दो-दो
का
इल्म
है
मुझको
है
फ़ईलुन
ये
जानता
हूँ
मैं
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Dipanshu Shams
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