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Dipanshu Shams
har saal intezar mulaqaat ka hua
har saal intezar mulaqaat ka hua | हर साल इंतिज़ार मुलाक़ात का हुआ
- Dipanshu Shams
हर
साल
इंतिज़ार
मुलाक़ात
का
हुआ
हर
साल
मिल
न
पाए
दिसबंर
से
जनवरी
- Dipanshu Shams
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ये
इंतिज़ार
सहर
का
था
या
तुम्हारा
था
दिया
जलाया
भी
मैं
ने
दिया
बुझाया
भी
Aanis Moin
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तुझे
कैसे
इल्म
न
हो
सका
बड़ी
दूर
तक
ये
ख़बर
गई
तिरे
शहर
ही
की
ये
शाएरा
तिरे
इंतिज़ार
में
मर
गई
Mumtaz Naseem
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सब
इंतज़ार
में
थे
कब
कोई
ज़बान
खुले
फिर
उसके
होंठ
खुले
और
सबके
कान
खुले
Umair Najmi
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न
कोई
वा'दा
न
कोई
यक़ीं
न
कोई
उमीद
मगर
हमें
तो
तिरा
इंतिज़ार
करना
था
Firaq Gorakhpuri
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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ये
दाग़
दाग़
उजाला
ये
शब-गज़ीदा
सहर
वो
इंतिज़ार
था
जिस
का
ये
वो
सहर
तो
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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बाग़-ए-बहिश्त
से
मुझे
हुक्म-ए-सफ़र
दिया
था
क्यूँँ
कार-ए-जहाँ
दराज़
है
अब
मिरा
इंतिज़ार
कर
Allama Iqbal
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मुझ
को
ये
आरज़ू
वो
उठाएँ
नक़ाब
ख़ुद
उन
को
ये
इंतिज़ार
तक़ाज़ा
करे
कोई
Asrar Ul Haq Majaz
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तिरी
सदा
का
है
सदियों
से
इंतिज़ार
मुझे
मिरे
लहू
के
समुंदर
ज़रा
पुकार
मुझे
Khalilur Rahman Azmi
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उम्र-ए-दराज़
माँग
के
लाई
थी
चार
दिन
दो
आरज़ू
में
कट
गए
दो
इंतिज़ार
में
Seemab Akbarabadi
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तन्हाई
ख़ामोशी
उसकी
यादें
और
मैं
रहते
हैं
इक
कमरे
में
सब
यार
ख़ुशी
से
Dipanshu Shams
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यार
छोड़ो
मज़ीद
मुश्किल
है
इल्मों-फ़न
की
ख़रीद
मुश्किल
है
झूठ
की
सेल
में
हक़ीक़त
की
मीडिया
से
उमीद
मुश्किल
है
वहशत-ए-इश्क़
में
मियाँ
तुमको
होना
मंज़िल
की
दीद
मुश्किल
है
शब
में
दीदारे-चाँद
गर
न
हुआ
सुब्ह
फिर
अपनी
ईद
मुश्किल
है
दौर-ए-रक़्सो-सुरूद
में
मिलना
शा'इरी
का
मुरीद
मुश्किल
है
याद-ए-याराँ
पे
मुस्कुराएँ
नईं
ऐसा
होना
शदीद
मुश्किल
है
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Dipanshu Shams
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हूँ
तेरी
साँसों
की
दरकार
राएगाँ
न
समझ
दरख़्त
मैं
हूँ
हवा-दार
राएगाँ
न
समझ
न
ऊब
दोस्त
सुकूँ
की
लुका-छुपी
से
अभी
है
खेल
ख़ूब
मज़ेदार
राएगाँ
न
समझ
जुनून-ए-इश्क़
को
समझे
है
राएगाँ
दुनिया
ख़ुदारा
तू
तो
मेरे
यार
राएगाँ
न
समझ
क़ुसूर-वार
हैं
हम
ग़लतियाँ
हमारी
थीं
तू
ख़ुद
को
बीच
की
दीवार
राएगाँ
न
समझ
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Dipanshu Shams
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अपनी
ही
ग़लतियों
से
ये
नादान
बंद
है
पिंजरे
में
मुश्किलों
के
हर
इंसान
बंद
है
छल
झूठ
ईर्ष्या
के
ही
कारण
से
'शम्स'
जी
लगता
है
आदिदेव
का
विषपान
बंद
है
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Dipanshu Shams
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क्यूँँ
लिखा
बद-नसीब
क़िस्मत
में
बीते
दिन-रात
इस
शिकायत
में
सिर्फ़
ख़ुद
को
ग़लत
न
समझे
आप
भूल
होती
है
सब
से
उजलत
में
यूँँ
मगन
हूँ
मैं
सोच
में
उसकी
जैसे
मज़दूर
कोई
मेहनत
में
राम
सीता
ने
लाज
रक्खी
बस
हम
से
क्या
हो
सका
मुहब्बत
में
ज़ख़्म
के
दर्द
से
ज़ियादा
दर्द
हम
ने
झेला
है
राह-ए-उल्फ़त
में
रोज़
कहता
है
फ़ालतू
इक
बात
कल
करूँँगा
ये
काम
फ़ुर्सत
में
रह
न
पाना
किसी
के
बिन
रहना
फ़र्क़
इतना
है
लत
और
आदत
में
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Dipanshu Shams
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