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Dipanshu Shams
Apni hi galatiyon se ye nadan band hai
अपनी ही ग़लतियों से ये नादान बंद है
- Dipanshu Shams
अपनी
ही
ग़लतियों
से
ये
नादान
बंद
है
पिंजरे
में
मुश्किलों
के
हर
इंसान
बंद
है
छल
झूठ
ईर्ष्या
के
ही
कारण
से
'शम्स'
जी
लगता
है
आदिदेव
का
विषपान
बंद
है
- Dipanshu Shams
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पक्का
है
इंतिज़ाम
ज़रा
इंतिज़ार
कर
लेंगे
ये
इंतिक़ाम
ज़रा
इंतिज़ार
कर
सय्याद
बुन
रखा
है
परिंदों
ने
अब
की
जाल
होगा
तू
ज़ेर-ए-दाम
ज़रा
इंतिज़ार
कर
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एक
ही
शय
फ़क़त
नज़र
ढूॅंढे
आदमियत
भरा
बशर
ढूॅंढे
पत्ते-पत्ते
में
प्यार
हो
जिसके
दिल
का
पंछी
वही
शजर
ढूॅंढे
फ़न
है
उसकी
ज़बान
में
और
वो
नासमझ
हाथ
में
हुनर
ढूॅंढे
ख़ुद
में
ही
तू
तो
एक
लावा
है
आग
फिर
क्यूँँ
इधर
उधर
ढूॅंढे
मंज़िलों
तक
नहीं
पहुँचता
वो
सिर्फ़
आसान
जो
डगर
ढूॅंढे
हाँ
ख़ुदा
भी
दिखेगा
तब
तुझको
अपने
माँ-बाप
में
अगर
ढूॅंढे
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Dipanshu Shams
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यूँँ
न
बे-मतलब
बढ़ा
बे-बात
का
रंग
है
हसीं
इक
दूसरे
के
साथ
का
रंग
यार
मेरे
कर
पहल
तू
दोस्ती
की
फिर
चढ़ेगा
ही
नहीं
उत्पात
का
रंग
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जो
चाहे
बेवफ़ाई
कर
रही
है
वफ़ा
की
आँखों
पर
पट्टी
बंधी
है
यक़ीं
का
क़त्ल
करते
वक़्त
बेशर्म
नहीं
इक
पल
को
भी
सहमी
डरी
है
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गर्मी
की
सुब्ह-सुब्ह
की
ठंडी
हवा
हो
तुम
इस
लू
लगे
मरीज़
की
जाना
शिफ़ा
हो
तुम
जिस
को
में
हँसते-हँसते
करूँँ
शौक़
से
क़ुबूल
ऐसे
ही
एक
जुर्म
की
प्यारी
सज़ा
हो
तुम
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