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Dipanshu Shams
pakka hai intizaam zara intizaar kar
pakka hai intizaam zara intizaar kar | पक्का है इंतिज़ाम ज़रा इंतिज़ार कर
- Dipanshu Shams
पक्का
है
इंतिज़ाम
ज़रा
इंतिज़ार
कर
लेंगे
ये
इंतिक़ाम
ज़रा
इंतिज़ार
कर
सय्याद
बुन
रखा
है
परिंदों
ने
अब
की
जाल
होगा
तू
ज़ेर-ए-दाम
ज़रा
इंतिज़ार
कर
- Dipanshu Shams
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सड़क
किनारे
लगा
के
दुकान
रंगों
की
तमाम
तितलियाँ
रंग
अपने
बेच
देती
हैं
Dipanshu Shams
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कोई
नंगा
हुआ
कोई
चीखा
इस
नुमाइश
का
मिल
रहा
पैसा
आदमी
है
सवाल
के
मानिंद
ये
हमेशा
समझने
पर
सुलझा
भूल
जाता
है
हाल
की
बातें
भूलते
ही
दिमाग़
है
कहता
भीड़
करती
रही
इशारे
पर
बात
गूँगे
की
समझा
बस
बहरा
ख़त्म
हो
जाते
मसअले
सारे
सुन
ने
वाले
की
गर
कोई
सुनता
राह-ए-मंज़िल
पे
गश्त
से
न
बचो
घाट
पहुँचे
है
बिन
चले
मुर्दा
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Dipanshu Shams
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नज़र
पड़ी
जो
मेरी
उस
नज़र
पे
नज़्म
हुई
नज़र
के
बाद
फिर
उसकी
कमर
पे
नज़्म
हुई
के
जैसे
तुझको
बनाया
गया
है
मेरे
लिए
ये
गुनगुनाते
हुए
हम-सफ़र
पे
नज़्म
हुई
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Dipanshu Shams
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तमाशे
के
लिए
उसको
फ़क़त
इंसाँ
जुटाने
हैं
मदारी
जानता
है
ये
ज़माना
पागलों
का
है
Dipanshu Shams
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बचपन
के
साथ
मौज-ओ-रवानी
चली
गई
शादी
के
बाद
शाम
सुहानी
चली
गई
बच्चे
की
देख-भाल
कमाने
की
फ़िक्र
में
कितनी
ही
लड़कियों
की
जवानी
चली
गई
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Dipanshu Shams
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