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Shadab Shabbiri
ab tiri yaad bhi nahin aati
ab tiri yaad bhi nahin aati | अब तिरी याद भी नहीं आती
- Shadab Shabbiri
अब
तिरी
याद
भी
नहीं
आती
दिल
के
अरमान
मर
गए
होंगे
- Shadab Shabbiri
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ज़िंदगी
में
तब
से
चाहत
की
रही
नइँ
जुस्तुजू
जब
से
हमने
आपसे
पहली
दफ़ा
की
गुफ़्तगू
Bhawna Bhatt
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सजा
है
प्रेम
का
उपवन
तुम्हीं
से
हमारी
चाह
है
पावन
तुम्हीं
से
सभी
में
प्रेम
देखें
प्रेम
चाहें
मिली
है
ये
मुझे
चितवन
तुम्हीं
से
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Vikas Sahaj
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उड़
गए
सारे
परिंदे
मौसमों
की
चाह
में
इंतिज़ार
उन
का
मगर
बूढे
शजर
करते
रहे
Ambreen Haseeb Ambar
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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इस
कमरे
में
लाश
पड़ी
है
चाहत
की
और
यहाँ
इक
याद
भटकती
रहती
है
Shivam Tiwari
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उसको
चाहा
और
चाहत
पर
क़ायम
हैं
पर
अफ़सोस
के
हम
इज़हार
नहीं
कर
सकते
Shadab Asghar
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बे-आरज़ू
भी
ख़ुश
हैं
ज़माने
में
बाज़
लोग
याँ
आरज़ू
के
साथ
भी
जीना
हराम
है
Shuja Khawar
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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बन
कर
कसक
चुभती
रही
दिल
में
मिरे
इक
आह
थी
ऐ
हम–नफ़स
मेरे
मुझे
तुझ
सेे
वफ़ा
की
चाह
थी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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इतना
ऊँचा
उड़ना
भी
कुछ
ठीक
नहीं
पाबंदी
लग
जाती
है
परवाज़ों
पर
तुझको
छू
कर
और
किसी
की
चाह
रखे
हैरत
है
और
लानत
है
ऐसे
हाथों
पर
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Varun Anand
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हुए
हैं
जाँ
ब-लब
शादाब
आ
पहुँचा
दम-ए-आख़िर
लो
अब
तकमील
को
पहुँची
विसाल-ए-यार
की
ख़्वाहिश
Shadab Shabbiri
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क्या
समझना
था
क्या
समझ
बैठे
नाखु़दा
को
ख़ुदा
समझ
बैठे
Shadab Shabbiri
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उस
मुहल्ले
को
छोड़
दूँ
कैसे
हैं
मिरा
यार
उस
मुहल्ले
में
Shadab Shabbiri
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नहीं
नक़्शे
पे
है
दीवार
घर
की
मिरी
दीवार
पे
नक़्शा
बना
है
Shadab Shabbiri
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ब-वक़्त-ए-मर्ग
पानी
मुँह
में
टपकाते
तो
अच्छा
था
ख़ुदाया
वो
अयादत
को
चले
आते
तो
अच्छा
था
Shadab Shabbiri
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