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Shadab Shabbiri
nahin naqshe pe hai deewaar ghar kii
nahin naqshe pe hai deewaar ghar kii | नहीं नक़्शे पे है दीवार घर की
- Shadab Shabbiri
नहीं
नक़्शे
पे
है
दीवार
घर
की
मिरी
दीवार
पे
नक़्शा
बना
है
- Shadab Shabbiri
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तफ़क्कुरात
का
मौसम
गुज़रने
वाला
है
ग़मों
से
चूर
था
जो
शख़्स
मरने
वाला
है
Shadab Shabbiri
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किसी
के
दिल
को
दुखाना
मुझे
पसंद
नहीं
क़सम
से
रोना
रुलाना
मुझे
पसंद
नहीं
Shadab Shabbiri
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आप
बड़े
थे
आप
बड़े
हैं
मैं
छोटा
था
मैं
छोटा
हूँ
आप
खरे
थे
आप
खरे
हैं
मैं
खोटा
था
मैं
खोटा
हूँ
Shadab Shabbiri
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सैर-ए-गुलशन
को
जब
वो
आए
हैं
तब
कहीं
फूल
मुस्कुराए
हैं
आग
बरसेगी
देखना
इक
दिन
ज़ुल्म-ओ-दहशत
के
अब्र
छाए
हैं
उनके
रुख़्सार-ओ-लब-क़द-ओ-क़ामत
फिर
से
महफ़िल
में
खींच
लाए
हैं
आप
की
बात
हमने
की
ही
नहीं
आप
क्यूँ
सुन
के
तिलमिलाए
हैं
सुन
रहा
हूँ
वो
आ
के
जाएँगे
अश्क
आँखों
में
डबडबाए
हैं
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Shadab Shabbiri
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नहीं
कोई
डर
है
फ़लाने
से
कह
दो
हथेली
पे
सर
है
फ़लाने
से
कह
दो
फ़लाने
से
कह
दो
कि
उनकी
नज़र
पर
हमारी
नज़र
है
फ़लाने
से
कह
दो
कहाँ
रात
थे
कल
फ़लाने
फ़लाने
हमें
सब
ख़बर
है
फ़लाने
से
कह
दो
जिसे
रात
दिन
वो
बताते
हैं
झूटा
वही
मो'तबर
है
फ़लाने
से
कह
दो
नहीं
दब
सकेगा
नहीं
रुक
सकेगा
हुजूमे-बशर
है
फ़लाने
से
कह
दो
डराना
जिसे
चाहते
हैं
फ़लाने
बहुत
वो
निडर
है
फ़लाने
से
कह
दो
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Shadab Shabbiri
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