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Shadab Shabbiri
Sair-e-gulshan ko jab vo aaye hain
सैर-ए-गुलशन को जब वो आए हैं
- Shadab Shabbiri
सैर-ए-गुलशन
को
जब
वो
आए
हैं
तब
कहीं
फूल
मुस्कुराए
हैं
आग
बरसेगी
देखना
इक
दिन
ज़ुल्म-ओ-दहशत
के
अब्र
छाए
हैं
उनके
रुख़्सार-ओ-लब-क़द-ओ-क़ामत
फिर
से
महफ़िल
में
खींच
लाए
हैं
आप
की
बात
हमने
की
ही
नहीं
आप
क्यूँ
सुन
के
तिलमिलाए
हैं
सुन
रहा
हूँ
वो
आ
के
जाएँगे
अश्क
आँखों
में
डबडबाए
हैं
- Shadab Shabbiri
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आना
है
तो
फिर
आइए
शिकवे
भुलाइए
जाना
है
अगर
आप
को
तो
जाइए
चुपचाप
Shadab Shabbiri
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क़िस्सा-ए-ज़ीस्त
मुख़्तसर
है
अब
हर
दवा
यार
बे-असर
है
अब
Shadab Shabbiri
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पहले
जो
कुछ
किया
था
वही
काम
कर
गई
हम
तो
समझ
रहे
थे
कि
दुनिया
सुधर
गई
Shadab Shabbiri
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दहर
की
बस
यही
हक़ीक़त
है
कुछ
नहीं
है
यहाँ
हक़ीक़त
में
Shadab Shabbiri
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मयकशी
ही
काम
है
क्यूँ
कहें
हराम
है
मय
नहीं
तो
बज़्म
में
ख़ाक
इन्तेज़ाम
है
तुम
हो
मेरे
सामने
तब
ये
जाम
जाम
है
तुम
हो
मेरे
हम
सेफ़र
क्या
हसीन
शाम
है
अब
हर
एक
आदमी
नफ़्स
का
ग़ुलाम
है
ग़ौर
कीजिए
जनाब
ग़ौर
का
मुक़ाम
है
है
ग़रीक़-ए-तीरगी
शम्अ
जिसका
नाम
है
नाम
राम
है
मगर
रावनों
का
काम
है
आप
ही
के
शह्र
में
आज
कल
क़याम
है
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Shadab Shabbiri
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