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Sanjay Bhat
manzilen aur bhi hain ik yahii dar nahin
manzilen aur bhi hain ik yahii dar nahin | मंज़िलें और भी हैं इक यही दर नहीं
- Sanjay Bhat
मंज़िलें
और
भी
हैं
इक
यही
दर
नहीं
ठान
लो
दिल
में
तो
दूर
अंबर
नहीं
- Sanjay Bhat
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और
हुआ
भी
ठीक
वो
ही
जिसका
डर
था
बोझ
इतना
रख
दिया
था
बुलबुले
पर
Siddharth Saaz
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नई
सुब्ह
पर
नज़र
है
मगर
आह
ये
भी
डर
है
ये
सहर
भी
रफ़्ता
रफ़्ता
कहीं
शाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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हमारे
जैसा
कोई
दर-ब-दर
नहीं
होगा
कहीं
पे
होगा
भी
तो
इस
कदर
नहीं
होगा
निकल
गया
हूँ
क़ज़ा
के
परे
तो
मैं
कबका
दे
जहर
भी
कोई
तो
अब
असर
नहीं
होगा
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Aadi Ratnam
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वो
कभी
आग़ाज़
कर
सकते
नहीं
ख़ौफ़
लगता
है
जिन्हें
अंजाम
से
Siraj Faisal Khan
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मुसाफ़िरों
के
दिमाग़ों
में
डर
ज़ियादा
है
न
जाने
वक़्त
है
कम
या
सफ़र
ज़ियादा
है
Hashim Raza Jalalpuri
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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हम
वो
हैं
जो
नइँ
डरते
वक़्त
के
इम्तिहान
से
वो
परिंदे
और
थे
जो
डर
गए
आसमान
से
Madhav
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अस्ल
में
पाया
ही
'दानिश'
तब
उसे
जब
उसे
खोने
का
डर
जाता
रहा
Madan Mohan Danish
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डर
है
घर
में
कैसे
बोला
जाएगा
छोड़ो
जो
भी
होगा
देखा
जाएगा
मैं
बस
उसका
चेहरा
पढ़कर
जाऊँगा
मेरा
पेपर
सब
सेे
अच्छा
जाएगा
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Vishal Singh Tabish
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दोस्त
कई
हैं
नज़र
में
फ़िक्र
उसी
सरकश
की
तीर
कई
खा
के
भी
चाह
उसी
तरकश
की
Sanjay Bhat
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ग़म
है
क्या
कुछ
पता
ही
नहीं
दर्द
है
पर
सज़ा
ही
नहीं
ज़ीस्त
बे-रंग
अदा
ही
नहीं
रंग
था
जो
खिला
ही
नहीं
हम
ही
मुजरिम
हैं
मालूम
है
और
किसी
की
ख़ता
ही
नहीं
दिल
की
बाज़ी
वो
हारा
है
यूँँ
जैसे
दिल
से
लड़ा
ही
नहीं
ज़िंदगी
संगदिल
है
बहुत
कौन
है
जो
पिसा
ही
नहीं
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Sanjay Bhat
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तराश
मुझ
को
कि
कोई
मिरा
सिरा
निकले
सिरा
दिखे
जो
अगर
कोई
सिलसिला
निकले
वो
सिलसिला
हो
तिरी
मेरी
ज़िंदगानी
का
अगर
जो
निकले
तो
हर
लफ़्ज़
हर
गिला
निकले
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Sanjay Bhat
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दिल
बाँध
के
रखा
है
रखा
है
फ़लक
पे
सर
मंज़िल
तो
दिख
रही
है
मगर
खो
गया
है
घर
Sanjay Bhat
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ये
किस
का
यक-ब-यक
ख़याल
आ
गया
जो
रुख़
पे
तेरे
फिर
जमाल
आ
गया
गिले
शिकायतें
नहीं
करेंगे
अब
ज़बाँ
पे
उन
के
भी
सवाल
आ
गया
कहाँ
कहाँ
से
आ
रहे
हो
टूट
कर
ये
ज़िंदगी
में
क्या
मलाल
आ
गया
ख़ुदास
पूछते
हैं
लोग
अब
सवाल
कि
पूछने
का
अब
कमाल
आ
गया
तरस
गए
हैं
खेत
बूँद
बूँद
को
ये
क्या
कि
फिर
से
ख़ुश्क
साल
आ
गया
हवा
के
ज़ोर
से
सफ़र
में
गिर
गए
अजब
ये
राह
में
ज़वाल
आ
गया
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Sanjay Bhat
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