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Sanjay Bhat
gham hai kya kuchh pata hi nahin
gham hai kya kuchh pata hi nahin | ग़म है क्या कुछ पता ही नहीं
- Sanjay Bhat
ग़म
है
क्या
कुछ
पता
ही
नहीं
दर्द
है
पर
सज़ा
ही
नहीं
ज़ीस्त
बे-रंग
अदा
ही
नहीं
रंग
था
जो
खिला
ही
नहीं
हम
ही
मुजरिम
हैं
मालूम
है
और
किसी
की
ख़ता
ही
नहीं
दिल
की
बाज़ी
वो
हारा
है
यूँँ
जैसे
दिल
से
लड़ा
ही
नहीं
ज़िंदगी
संगदिल
है
बहुत
कौन
है
जो
पिसा
ही
नहीं
- Sanjay Bhat
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और
भी
दुख
हैं
ज़माने
में
मोहब्बत
के
सिवा
राहतें
और
भी
हैं
वस्ल
की
राहत
के
सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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ज़ख़्म
दिल
पर
हज़ार
करता
है
और
कहता
है
प्यार
करता
है
दर्द
दिल
में
उतर
गया
कैसे
कोई
अपना
ही
वार
करता
है
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Santosh S Singh
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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वो
सर
भी
काट
देता
तो
होता
न
कुछ
मलाल
अफ़्सोस
ये
है
उस
ने
मेरी
बात
काट
दी
Tahir Faraz
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दर्द
में
शिद्दत-ए-एहसास
नहीं
थी
पहले
ज़िंदगी
राम
का
बन-बास
नहीं
थी
पहले
Shakeel Azmi
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हर
दुख
का
है
इलाज,
उसे
देखते
रहो
सबकुछ
भुला
के
आज
उसे
देखते
रहो
देखा
उसे
तो
दिल
ने
ये
बे-साख़्ता
कहा
छोड़ो
ये
काम
काज
उसे
देखते
रहो
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Aslam Rashid
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ज़ख़्म
दिल
के
भरे
नहीं
अब
तक
और
इक
दर्द
फिर
हरा
कर
लूँ
अब
भरोसा
नहीं
किसी
का
पर
तू
कहे
तो
यक़ीं
तिरा
कर
लूँ
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Harsh saxena
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कब
ठहरेगा
दर्द
ऐ
दिल
कब
रात
बसर
होगी
सुनते
थे
वो
आएँगे
सुनते
थे
सहर
होगी
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हारे
बाद
ये
दुख
भी
तो
सहना
पड़
रहा
है
किसी
के
साथ
मजबूरी
में
रहना
पड़
रहा
है
Ali Zaryoun
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वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
Zubair Ali Tabish
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कुछ
यहाँ
बेवजह
नहीं
होता
आग
हो
तो
धुआँ
भी
होता
है
Sanjay Bhat
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ऐसे
इंसाँ
से
नाता
नहीं
दिल
की
धड़कन
जो
सुनता
नहीं
तुम
जो
मरहम
करोगे
तो
क्या
ज़ख़्म
हूँ
वो
जो
भरता
नहीं
घर
के
कोने
में
रहने
तो
दे
मैं
तो
बूढ़ा
हूँ
हिलता
नहीं
वो
अँधेरे
से
डरता
है
क्या
चाँद
तन्हा
वो
दिखता
नहीं
अब
तसल्ली
न
आईना
दे
क्यूँ
मैं
अब
ख़ुद
पे
मरता
नहीं
तुम
जो
मुझ
से
मिलो
तो
मिलूँ
मैं
यूँँ
ख़ुद
से
भी
मिलता
नहीं
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Sanjay Bhat
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कहाँ
यकसाँ
नज़र
है
कहाँ
यकसानियत
है
है
हासिल
सब
किसी
को
किसी
को
रिज़्क़
भी
कम
Sanjay Bhat
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सूरत
मिरी
तनख़्वाह
की
कुछ
यूँँ
है
अब
जब
भी
टटोलूँ
जेब
तो
निकले
है
आह
Sanjay Bhat
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चोट
कोई
तो
है
यूँँ
ही
तो
दर्द
नहीं
ये
रुख़्सार
तिरा
यूँँ
ही
तो
ज़र्द
नहीं
कुछ
उलझन
है
तो
अर्ज़ी
दे
ज़ाहिर
तो
कर
फिर
न
बताना
रब
तेरा
हमदर्द
नहीं
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Sanjay Bhat
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