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Sanjay Bhat
ye kis ka yak-b-yak khayal aa gaya
ye kis ka yak-b-yak khayal aa gaya | ये किस का यक-ब-यक ख़याल आ गया
- Sanjay Bhat
ये
किस
का
यक-ब-यक
ख़याल
आ
गया
जो
रुख़
पे
तेरे
फिर
जमाल
आ
गया
गिले
शिकायतें
नहीं
करेंगे
अब
ज़बाँ
पे
उन
के
भी
सवाल
आ
गया
कहाँ
कहाँ
से
आ
रहे
हो
टूट
कर
ये
ज़िंदगी
में
क्या
मलाल
आ
गया
ख़ुदास
पूछते
हैं
लोग
अब
सवाल
कि
पूछने
का
अब
कमाल
आ
गया
तरस
गए
हैं
खेत
बूँद
बूँद
को
ये
क्या
कि
फिर
से
ख़ुश्क
साल
आ
गया
हवा
के
ज़ोर
से
सफ़र
में
गिर
गए
अजब
ये
राह
में
ज़वाल
आ
गया
- Sanjay Bhat
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कटी
ज़ीस्त
सारी
अकेले
अकेले
पड़ी
हम
पे
भारी
अकेले
अकेले
मिला
ही
नहीं
कोई
हम
को
सफ़र
में
सफ़र
तो
है
जारी
अकेले
अकेले
सलीक़ा
न
आया
जब
उड़ने
का
हम
को
शजर
पर
गुज़ारी
अकेले
अकेले
जलो
तुम
भी
इस
आग
में
साथ
मेरे
हो
क्यूँँ
बे-क़रारी
अकेले
अकेले
ये
गुलशन
ये
घर
और
ये
दुनिया
हमारी
तुम्हीं
ने
सँवारी
अकेले
अकेले
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Sanjay Bhat
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कभी
तू
भी
हँसा
कर
क्या
फ़क़त
रोने
ही
आया
है
खिली
है
वो
ज़मीं
भी
जिस
ने
सागर
को
बहाएा
है
Sanjay Bhat
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एक
लम्हा
भी
क्यूँ
क़रार
नहीं
दिल
बुझा
तो
है
सोगवार
नहीं
तुम
तसल्ली
तो
दे
रहे
हो
मुझे
ग़म
पे
क्यूँ
मुझ
को
इख़्तियार
नहीं
दिल
से
ज़िंदा
हो
तो
रहो
दिल
में
दिल
है
मेरा
कोई
मज़ार
नहीं
मौत
ही
जब
नजात
दे
ग़म
से
क्यूँ
हमें
उस
का
इंतिज़ार
नहीं
अक्स
दिख
तो
रहा
है
शीशे
में
मेरे
चेहरे
पे
वो
बहार
नहीं
तेरे
हाथों
में
क्यूँ
ये
पत्थर
है
अब
किसी
को
किसी
से
प्यार
नहीं
लोग
और
भी
तो
जल
रहे
हैं
यहाँ
सिर्फ़
तेरा
ही
ये
ग़ुबार
नहीं
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Sanjay Bhat
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सूरत
मिरी
तनख़्वाह
की
कुछ
यूँँ
है
अब
जब
भी
टटोलूँ
जेब
तो
निकले
है
आह
Sanjay Bhat
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तेरे
तेशे
से
गुज़र
के
है
बनी
ये
मूरत
चोट
खा
खा
के
बनी
है
ये
चमकती
सूरत
Sanjay Bhat
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