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Sanjay Bhat
kabhi tu bhi hansa kar kya faqat rone hi aaya hai
kabhi tu bhi hansa kar kya faqat rone hi aaya hai | कभी तू भी हँसा कर क्या फ़क़त रोने ही आया है
- Sanjay Bhat
कभी
तू
भी
हँसा
कर
क्या
फ़क़त
रोने
ही
आया
है
खिली
है
वो
ज़मीं
भी
जिस
ने
सागर
को
बहाएा
है
- Sanjay Bhat
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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बड़े
बूढों
के
घर
को
अब
जो
बच्चे
छोड़
देते
हैं
समुंदर
साहिलों
तक
आ
के
रस्ता
मोड़
देते
हैं
वसीयत
में
कोई
भी
दस्तख़त
जाली
नहीं
होता
ये
पूरे
होश
में
अपने
ही
घर
को
तोड़
देते
हैं
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anupam shah
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कौन
डूबेगा
किसे
पार
उतरना
है
'ज़फ़र'
फ़ैसला
वक़्त
के
दरिया
में
उतर
कर
होगा
Ahmad Zafar
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दूर
से
ही
बस
दरिया
दरिया
लगता
है
डूब
के
देखो
कितना
प्यासा
लगता
है
Waseem Barelvi
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ये
कब
कहते
हैं
कि
आकर
हमको
गले
लगा
ले
वो
मिल
जाए
तो
रस्मन
ही
बस
हाथ
मिला
ले
काफ़ी
है
इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
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Vashu Pandey
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किसी
ने
कहा
था
टूटी
हुई
नाव
में
चलो
दरिया
के
साथ
आप
की
रंजिश
फ़ुज़ूल
है
Shahid Zaki
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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कभी
दरिया
में
जिनकी
कश्तियाँ
थी
वही
अब
साहिलों
पे
रो
रहे
हैं
Siddharth Saaz
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चल
दिए
घर
से
तो
घर
नहीं
देखा
करते
जाने
वाले
कभी
मुड़
कर
नहीं
देखा
करते
सीपियां
कौन
किनारे
से
उठा
कर
भागा
ऐसी
बाते
समुंदर
नहीं
देखा
करते
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Unknown
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चाँद
चेहरा
ज़ुल्फ़
दरिया
बात
ख़ुशबू
दिल
चमन
इक
तुम्हें
दे
कर
ख़ुदा
ने
दे
दिया
क्या
क्या
मुझे
Bashir Badr
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कई
रंगों
में
ख़ुद
को
ढालती
हैं
सभी
रिश्तें
वो
दिल
से
पालती
हैं
फ़रिश्तों
जैसे
गुण
हैं
बेटियों
में
हँसी
से
अपनी
सब
दुख
टालती
हैं
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Sanjay Bhat
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गुज़रे
जब
उस
राह
से
देखा
न
मुड़
के
जो
ख़लिश
थी
छोड़
आए
हैं
सड़क
पर
Sanjay Bhat
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कितने
अल्फ़ाज़
बिखेरे
मैं
ने
बात
फिर
भी
न
मिरी
वो
समझे
पास
आऊँ
तो
करे
है
वो
दूर
जैसे
वो
आँख
से
आँसू
झटके
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Sanjay Bhat
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मैं
बहते
बहते
चल
रहा
हूँ
तेरी
जानिब
निकल
रहा
हूँ
तपता
है
अब
ये
जिस्म
मेरा
तेरी
ख़्वाहिश
में
जल
रहा
हूँ
बद-हाल
हूँ
मैं
कोई
सजाए
मैं
मिट्टी
का
हूँ
गल
रहा
हूँ
हसरत
न
कोई
कमर
झुकी
सी
मिट्टी
छूने
निकल
रहा
हूँ
तक़दीर
से
खेलना
है
मुझ
को
बच्चों
की
तरह
मचल
रहा
हूँ
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Sanjay Bhat
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हासिल
नहीं
अब
कुछ
भी
आहों
के
सिवा
दरकार
थी
मंज़िल
मशक़्क़त
के
बिना
Sanjay Bhat
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