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Sanjay Bhat
kati zeest saari akelaa akelaa
kati zeest saari akelaa akelaa | कटी ज़ीस्त सारी अकेले अकेले
- Sanjay Bhat
कटी
ज़ीस्त
सारी
अकेले
अकेले
पड़ी
हम
पे
भारी
अकेले
अकेले
मिला
ही
नहीं
कोई
हम
को
सफ़र
में
सफ़र
तो
है
जारी
अकेले
अकेले
सलीक़ा
न
आया
जब
उड़ने
का
हम
को
शजर
पर
गुज़ारी
अकेले
अकेले
जलो
तुम
भी
इस
आग
में
साथ
मेरे
हो
क्यूँँ
बे-क़रारी
अकेले
अकेले
ये
गुलशन
ये
घर
और
ये
दुनिया
हमारी
तुम्हीं
ने
सँवारी
अकेले
अकेले
- Sanjay Bhat
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देखो
ना
इश्क़
में
क्या
है
मिलता
बेकली
अश्क
और
दिल
का
जलना
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ऐ
रब
तिरी
तलाश
से
उकता
गया
हूँ
मैं
चलते
ही
तेरी
राह
पे
मुरझा
गया
हूँ
मैं
थोड़ा
तो
खोल
दे
तू
भी
दिल
का
किवाड़
अब
हर
बार
ना-उमीद
ही
भेजा
गया
हूँ
मैं
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Sanjay Bhat
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ग़म
है
क्या
कुछ
पता
ही
नहीं
दर्द
है
पर
सज़ा
ही
नहीं
ज़ीस्त
बे-रंग
अदा
ही
नहीं
रंग
था
जो
खिला
ही
नहीं
हम
ही
मुजरिम
हैं
मालूम
है
और
किसी
की
ख़ता
ही
नहीं
दिल
की
बाज़ी
वो
हारा
है
यूँँ
जैसे
दिल
से
लड़ा
ही
नहीं
ज़िंदगी
संगदिल
है
बहुत
कौन
है
जो
पिसा
ही
नहीं
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Sanjay Bhat
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था
जुनूँ
दिल
में
असर
जाने
तक
दिल
की
दिल
में
रही
नक़्स
आने
तक
उनका
आना
है
फ़क़त
खेल
कोई
बस
रुके
हैं
वो
तो
उलझाने
तक
जो
अना
यूँँ
ही
कुशादा
सी
थी
सिमटी
है
लोगों
को
उकसाने
तक
मेरे
अफ़्साने
में
थे
कुछ
छुपे
राज़
पहुँचे
हैं
जो
किसी
बेगाने
तक
उम्र
भर
की
न
बुझी
प्यास
तेरी
चल
चलें
हम
किसी
मयख़ाने
तक
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Sanjay Bhat
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इसी
रस्ते
से
मैं
अक्सर
गुज़रता
हूँ
मैं
जो
गिरता
हूँ
तो
फिर
से
उभरता
हूँ
यही
तरतीब
क्यूँ
जारी
है
सदियों
से
सवेरे
जी
उठूँ
तो
शब
को
मरता
हूँ
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