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Sandhya maurya
may kabhi peena nahin jaana nahin
may kabhi peena nahin jaana nahin | मय कभी पीना नहीं जाना नहीं
- Sandhya maurya
मय
कभी
पीना
नहीं
जाना
नहीं
इक
शराबी
मुझको
ये
समझा
रहा
- Sandhya maurya
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मुझे
शराब
पिलाई
गई
है
आँखों
से
मेरा
नशा
तो
हज़ारों
बरस
में
उतरेगा
Vijendra Singh Parwaaz
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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दुनिया
को
मारा
जिगर
के
शे'रों
ने
जिगर
को
शराब
ने
मारा
Jigar Moradabadi
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छू
लेने
दो
नाज़ुक
होंठों
को,
कुछ
और
नहीं
हैं
जाम
हैं
ये
क़ुदरत
ने
जो
हमको
बख़्शा
है,
वो
सब
सेे
हसीं
ईनाम
हैं
ये
Sahir Ludhianvi
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कुछ
भी
बचा
न
कहने
को
हर
बात
हो
गई
आओ
कहीं
शराब
पिएँ
रात
हो
गई
Nida Fazli
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तुम्हारी
आँखों
की
तौहीन
है
ज़रा
सोचो
तुम्हारा
चाहने
वाला
शराब
पीता
है
Munawwar Rana
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लब
हैं
जैसे
गुल
सुमबुल
रंग-ए-याक़ूती
ख़ुद
को
मैख़ाना
तितली
का
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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खद्दर
पहन
के
बेच
रहा
था
शराब
वो
देखा
मुझे
तो
हाथ
में
झंडा
उठा
लिया
मैं
भी
कोई
गँवार
सिपाही
न
था
जनाब
मैंने
भी
जाम
फेंक
के
डंडा
उठा
लिया
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Paplu Lucknawi
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आए
थे
हँसते
खेलते
मय-ख़ाने
में
'फ़िराक़'
जब
पी
चुके
शराब
तो
संजीदा
हो
गए
Firaq Gorakhpuri
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है
बड़ी
पुर-कैफ़
वो
तस्वीर
उसकी
क्या
कहें
दिलकश
बड़ी
है
हीर
उसकी
जाँ
हमारी
हम
ख़ुशी
से
दें
तभी
तो
इस
गले
पर
हो
अगर
शमशीर
उसकी
प्यार
पर
तेरे
भरोसा
कर
लिया
था
हाँ
फ़क़त
इतनी
रही
तक़्सीर
उसकी
इस
तरह
अब
दिल
मिरा
क़ैदी
हुआ
है
है
क़फ़स
मेरा
मगर
ज़ंजीर
उसकी
बस
रहे
गंदी
निगाहों
से
बची
वो
या-ख़ुदा
ऐसी
बना
तक़दीर
उसकी
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Sandhya maurya
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हमें
छोड़ो
हमारे
हाल
पर
तुम
कहो
कैसी
तबीअत
है
तुम्हारी
Sandhya maurya
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गीतों
में
जो
मुखड़ा
बनता
है
वो
ग़ज़लों
में
मतला
बनता
है
खेल
दिखाकर
बोला
जादूगर
देखो
अब
देखो
क्या
बनता
है
मुझपे
जब
भी
किरणें
पड़ती
हैं
दीवारों
पर
साया
बनता
है
और
कहीं
बनते
होंगे
आदम
चाक
पे
केवल
ख़ाका
बनता
है
सारे
हक़
जब
तुझको
दे
डाले
तेरा
मुझ
सेे
लड़ना
बनता
है
बनता
है
जब
पीठ
पे
एक
भँवर
तब
जाकर
कुछ
पैसा
बनता
है
वहशत
से
जो
देखता
है
औरत
आगे
चलकर
अंधा
बनता
है
किस
साॅंचे
ने
उसे
बनाया
फिर
जिस
सेे
ख़ुद
ही
साॅंचा
बनता
है
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Sandhya maurya
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चलो
मैं
तो
तुम्हारी
बात
पर
कर
लूँ
यक़ीं
थोड़ा
मगर
तुम
आदमी
हो
आदमी
का
क्या
भरोसा
हैं
Sandhya maurya
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ख़्वाब
मेरे
यार
आख़िर
हो
गए
बेकार
आख़िर
दास्ताँ
मरने
लगी
है
क्या
करे
किरदार
आख़िर
कर
रहे
हो
बात
कैसी
तुम
भी
मेरे
यार
आख़िर
हम
लड़ें
ये
चाहती
है
हरघड़ी
सरकार
आख़िर
सामने
ख़ुद
के
ख़ुदी
हम
हो
गए
दीवार
आख़िर
वो
न
समझेगा
हुए
हम
जिस
क़दर
लाचार
आख़िर
फिर
उसी
से
हो
गया
है
इश्क़
मुझको
यार
आख़िर
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Sandhya maurya
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