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Prit
tujhe paana zaraa mushkil sa lagta hai
tujhe paana zaraa mushkil sa lagta hai | तुझे पाना ज़रा मुश्किल सा लगता है
- Prit
तुझे
पाना
ज़रा
मुश्किल
सा
लगता
है
तू
इक
मुफ़लिस
के
महँगे
ख़्वाब
जैसा
है
- Prit
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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मत
बताना
कि
बिखर
जाएँ
तो
क्या
होता
है
नईं
नस्लों
को
नए
ख़्वाब
सजाने
देना
Ameer Imam
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हम
उसे
आँखों
की
दहलीज़
न
चढ़ने
देते
नींद
आती
न
अगर
ख़्वाब
तुम्हारे
लेकर
एक
दिन
उसने
मुझे
पाक
नज़र
से
चूमा
उम्र
भर
चलना
पड़ा
मुझको
सहारे
लेकर
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Aalok Shrivastav
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ख़्वाब
इतना
भी
हसीं
मत
देखो
नींद
टूटे
तो
न
ये
शब
गुज़रे
anupam shah
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गुज़र
रहा
हूँ
किसी
ख़्वाब
के
इलाक़े
से
ज़मीं
समेटे
हुए
आसमाँ
उठाए
हुए
Aziz Nabeel
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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ऐसा
है
कि
सब
ख़्वाब
मुसलसल
नहीं
होते
जो
आज
तो
होते
हैं
मगर
कल
नहीं
होते
Ahmad Faraz
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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ये
ज़रूरी
है
कि
आँखों
का
भरम
क़ाएम
रहे
नींद
रक्खो
या
न
रक्खो
ख़्वाब
मेयारी
रखो
Rahat Indori
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कटती
है
आरज़ू
के
सहारे
पे
ज़िंदगी
कैसे
कहूँ
किसी
की
तमन्ना
न
चाहिए
Shaad Arfi
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जन्मदिन
में
यही
तो
ख़ास
था
प्रीत
रोज़
के
जैसा
गुज़रा
ये
दिन
भी
Prit
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वो
मेरी
फाल्गुनी,
मैं
उसका
माँझी
हूँ
मैं
शब्दों
से
ग़ज़लों
के
पर्वत
खोदूँगा
Prit
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वो
तन
अजमेर
की
चौखट,
वो
दिल
वाराणसी
का
दर
मेरा
माही
मेरा
मज़हब
है,
उसका
दिल
है
मेरा
घर
Prit
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तू
मेरा
हो
के
भी
कौन
सा
मेरा
था
तुझ
से
यानी
मेरी
कोई
फ़ुर्क़त
नहीं
Prit
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चाहता
था
मैं
साहिर
बनूँ
लेकिन
इमरोज़
बनना
पड़ा
Prit
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