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Naresh sogarwal 'premi'
neki karke chala hai bhala aadmi
neki karke chala hai bhala aadmi | नेकी करके चला है भला आदमी
- Naresh sogarwal 'premi'
नेकी
करके
चला
है
भला
आदमी
फिर
सताया
गया
है
भला
आदमी
दौर
में
ही
ख़ला
है
भला
आदमी
होना
भी
तो
बला
है
भला
आदमी
कितना
मुश्किल
है
रहना
ज़बाँ
पर
मगर
होना
भी
तो
कड़ा
है
भला
आदमी
देखकर
चेहरे
को
हादसे
आते
नइँ
किस
के
माथे
लिखा
है
भला
आदमी
नइँ
रहा
ये
ज़माना
भलाई
का
भी
दौर
को
नइँ
मिला
है
भला
आदमी
- Naresh sogarwal 'premi'
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अधूरे
शे'र
के
मिसरों
को
देखा
तो
किसे
कहते
हैं
तन्हाई
समझ
आई
Sunny Seher
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दबी
कुचली
हुई
सब
ख़्वाहिशों
के
सर
निकल
आए
ज़रा
पैसा
हुआ
तो
च्यूँँटियों
के
पर
निकल
आए
अभी
उड़ते
नहीं
तो
फ़ाख़्ता
के
साथ
हैं
बच्चे
अकेला
छोड़
देंगे
माँ
को
जिस
दिन
पर
निकल
आए
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Mehshar Afridi
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बस
एक
मैं
था
जिस
सेे
सच
मुच
में
दिलबरी
की
वरना
हर
आदमी
से
उसने
दो
नंबरी
की
जिस
बात
में
भी
हमने
ख़ुद
को
अकेला
रक्खा
बाग़ात
में
भी
हमने
जोड़ों
की
मुख़बरी
की
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Muzdum Khan
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ऐब
हज़ारों
दिखते
हैं
मुझको
मेरी
परछाई
में
यानी
शीशे
से
मिलता
हूँ
अक्सर
मैं
तन्हाई
में
Ravi 'VEER'
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पता
करो
कि
मेरे
साथ
कौन
उतरा
था
ज़मीं
पे
कोई
अकेला
नहीं
उतरता
है
Ahmad Abdullah
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अभी
तो
शाम
की
दस्तक
हुई
है
अभी
से
लग
गया
बिस्तर
हमारा
यही
तन्हाई
है
जन्नत
हमारी
इसी
जन्नत
में
है
अब
घर
हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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नाप
रहा
था
एक
उदासी
की
गहराई
हाथ
पकड़कर
वापस
लायी
है
तन्हाई
वस्ल
दिनों
को
काफ़ी
छोटा
कर
देता
है
हिज्र
बढ़ा
देता
है
रातों
की
लम्बाई
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Tanoj Dadhich
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पहले
तो
वो
हाथ
पकड़कर
कमरे
से
बाहर
लाया
और
फिर
मुझको
इस
दुनिया
में
यार
अकेला
छोड़
गया
Tanoj Dadhich
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उम्र
शायद
न
करे
आज
वफ़ा
काटना
है
शब-ए-तन्हाई
का
Altaf Hussain Hali
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जब
तुम्हें
सुनता
हूँ
खोने
लग
जाता
हूँ
ऐसी
ही
धुन
पे
मैं
रोने
लग
जाता
हूँ
Naresh sogarwal 'premi'
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ऐ
सनम
हमारे
तो
बड़े
नसीब
हैं
ख़राब
इत्तिफ़ाक़
में
ये
लड़का
ग़मज़दा
मिला
तुम्हें
Naresh sogarwal 'premi'
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और
यूँँ
ही
ये
त्योहार
आते
रहें
याद
तुमको
हमारी
दिलाते
रहें
ये
मोहब्बत
की
ख़्वाहिश
भी
है
इंतिज़ार
इश्क़
में
जान
अपनी
जलाते
रहें
लड़कियाँ
देर
तक
ही
मना
करती
हैं
उनका
बस
चैन
और
चित
चुराते
रहें
औरतें
अपनी
हस्ती
को
हैं
चाहती
मर्द
इज़्ज़त
से
बस
पेश
आते
रहें
ज़िंदा
रहने
की
तरकीब
ये
है
कि
दोस्त
अपनी
बेचैनी
ख़ुद
ही
बढ़ाते
रहें
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Naresh sogarwal 'premi'
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बस
में
नहीं
मेरे
कि
लिखूँ
ग़म
भी
मैं
अपना
कोई
तो
है
जो
मुझ
से
ये
सब
करवा
रहा
है
Naresh sogarwal 'premi'
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हम
तो
जान-ए-जाँ
मिले
बग़ैर
ही
बिछड़
गए
हमने
तो
गुज़ारनी
थी
एक
साथ
ज़िंदगी
Naresh sogarwal 'premi'
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