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Naresh sogarwal 'premi'
bas men nahin mere ki likhoon gham bhi main apna
bas men nahin mere ki likhoon gham bhi main apna | बस में नहीं मेरे कि लिखूँ ग़म भी मैं अपना
- Naresh sogarwal 'premi'
बस
में
नहीं
मेरे
कि
लिखूँ
ग़म
भी
मैं
अपना
कोई
तो
है
जो
मुझ
से
ये
सब
करवा
रहा
है
- Naresh sogarwal 'premi'
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मेरे
ग़मों
का
रोज़
जबूँ-हाल
वही
है
अज़-रूए
भी
यादों
का
नसा-जाल
वही
है
जानाँ
कभी
तो
सुन
तू
मिरे
दिल
की
दुहाई
सो
धड़कनों
की
आज
भी
अक़्वाल
वही
है
गुज़रा
है
मिरा
वक़्त
सितादा
में
वही
हूँ
मेरे
लिए
बीता
आज
भी
मह-ओ-साल
वही
है
जाँ
जबसे
सँभाला
है
ये
औसान
जो
मैंने
बदला
नहीं
कुछ
आज
भी
अहवाल
वही
है
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दर्द
जब
आँख
के
बाम-ओ-दर
होते
हैं
क्या
करें
शाम
को
सब
ही
घर
होते
हैं
झपकियाँ
लेती
आँखें
उचट
जब
गईं
तब
हुआ
इल्म
ख़्वाबों
के
पर
होते
हैं
जब
बदन
से
निकल
कर
कोई
रोता
है
रूह
के
दिल
दिमाग़
और
सर
होते
हैं
जिनसे
उम्मीद
है
सबकी
कुछ
करने
की
लोग
वो
ख़ुदस
ही
बे-ख़बर
होते
हैं
मिल
के
जो
परवरिश
करते
हैं
बच्चों
की
अस्ल
में
वे
ही
कुंबे
प्रवर
होते
हैं
जो
समझते
हैं
दुख
दूसरों
का
वही
लोग
सच्चे
ख़ुदा
के
बशर
होते
हैं
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करूँँगा
क्या
मैं
जानाँ
तुमको
जब
खो
कर
कि
उसके
बाद
क्या
नौकर
हो
जाऊँ
गर
अभी
है
तो
निभा
फिर
आज
का
तू
साथ
पता
क्या
कौन
बैठा
है
किसे
खो
कर
मिरी
फिर
ज़िंदगी
में
कोई
गर
आए
समझ
लो
हिज्र
में
आया
हूँ
मैं
रो
कर
मुहब्बत
ही
बचा
सकती
है
मुझको
अब
अगर
दो
जाँ
में
चाहत
गुज़रे
इक
हो
कर
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तंग
आ
चुके
हैं
अपनी
ही
बेकली
से
फिर
हम
ठुकरा
न
दें
कहीं
ख़ुद
को
बेख़ुदी
से
फिर
हम
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नहीं
है
ज़ख़्मों
को
बर्दाश्त
मुझको
चैन
कहाँ
कि
मेरे
घाव
महकते
हैं
फूलों
की
जैसे
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