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Naresh sogarwal 'premi'
jab tumhein sunta hooñ khone lag jaata hooñ
jab tumhein sunta hooñ khone lag jaata hooñ | जब तुम्हें सुनता हूँ खोने लग जाता हूँ
- Naresh sogarwal 'premi'
जब
तुम्हें
सुनता
हूँ
खोने
लग
जाता
हूँ
ऐसी
ही
धुन
पे
मैं
रोने
लग
जाता
हूँ
- Naresh sogarwal 'premi'
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रहता
हूँ
आठों
पहर
तुझ
में
ही
लेकिन
मिलने
को
इक
पास
लम्हा
भी
नहीं
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तुम
किसी
तरह
मिरे
क़रीब
आ
नहीं
सकी
तुमको
आने
से
मिरा
ख़याल
रोक
नइँ
सका
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आँख
में
अश्क
भी
बचाना
है
रोना
है
ख़ुद
को
ही
सताना
है
ख़ुद
को
इतना
भी
तो
बचाना
है
हिज्र
को
हँसना
भी
सिखाना
है
रोना
नइँ
है
किसी
के
भी
आगे
ग़म
तुझे
इतना
भी
बुझाना
है
दिन
को
वो
रोज़
डूब
जाता
है
चाँद
को
बे-अजल
बुलाना
है
पैसे
का
स्रोत
गर
मुझे
हो
जाए
हिज्र
को
ठीक
से
मनाना
है
हो
मुलाक़ात
गर
कभी
उस
सेे
जिस्म
ज़ख़्मों
का
ये
दिखाना
है
गोया
मैं
रोज़
मर
सा
जाता
हूँ
किसी
दिन
मर
के
भी
दिखाना
है
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इश्क़
के
अज़ाब
में
भी
क्या
से
क्या
नहीं
सहा
उसने
आज
तक
मुझे
कभी
भी
तू
नहीं
कहा
उसके
रूठने
पे
हम
तो
उसके
आप
ही
रहे
हो
गए
जुदा
भी
उसको
बे-वफ़ा
नहीं
कहा
ऐसा
भी
नहीं
कि
उसको
याद
भी
किया
न
हो
आँख
भर
गई
प'
अश्क
गाल
तक
नहीं
बहा
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न
हारा
है
हिज्र
और
न
ईज़ा
थकी
है
मुहब्बत
में
तन्हाई
की
चल
रही
है
नहीं
है
मगर
उसकी
मौजूदगी
है
हक़ीक़त
में
अब
कल्पना
ही
बची
है
बदन
खा
रही
है
मिरी
ये
ख़मोशी
तबीअत
को
तन्हाई
भी
भा
रही
है
है
फ़ुर्सत
ही
फ़ुर्सत
है
ज़हमत
ही
ज़हमत
कि
आँखों
में
मेरी
नमी
ही
नमी
है
मिरी
आश्ती
मुझको
अब
तन्हा
कर
दे
मुहब्बत
भुलाए
मुझे
जा
रही
है
लिए
हौसला
साथ
नाकामियों
का
जिसे
कहते
शायद
यही
ज़िन्दगी
है
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