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Prasoon
do qadam saath gar chale hote
do qadam saath gar chale hote | दो क़दम साथ गर चले होते
- Prasoon
दो
क़दम
साथ
गर
चले
होते
सिलसिले
और
बन
गए
होते
- Prasoon
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आहट
सी
कोई
आए
तो
लगता
है
कि
तुम
हो
साया
कोई
लहराए
तो
लगता
है
कि
तुम
हो
Jaan Nisar Akhtar
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हर
क़दम
हर
साँस
गिरवी
ज़िंदगी
रहम-ओ-करम
इतने
एहसानों
पे
जीने
से
तो
मर
जाना
सही
Ajeetendra Aazi Tamaam
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दे
रहे
हैं
लोग
मेरे
दिल
पे
दस्तक
बार
बार
दिल
मगर
ये
कह
रहा
है
सिर्फ़
तू
और
सिर्फ़
तू
Fareeha Naqvi
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अभी
तो
शाम
की
दस्तक
हुई
है
अभी
से
लग
गया
बिस्तर
हमारा
यही
तन्हाई
है
जन्नत
हमारी
इसी
जन्नत
में
है
अब
घर
हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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तुझे
ख़याल
नहीं
है
सो
हम
बढ़ा
रहे
हैं
फिर
इक
दफ़ा
तेरी
ज़ानिब
क़दम
बढ़ा
रहे
हैं
बहुत
से
आए
तुझे
जीतने
की
ख़्वाहिश
में
हम
एक
कोने
में
बैठे
रक़म
बढ़ा
रहे
हैं
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Zahid Bashir
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बाहरस
उतना
ही
शोर
मचाता
है
जो
अंदर
से
जितना
ख़ाली
होता
है
Sadia Sawera
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अब
तो
चुप-चाप
शाम
आती
है
पहले
चिड़ियों
के
शोर
होते
थे
Mohammad Alvi
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जब
फागुन
रंग
झमकते
हों
तब
देख
बहारें
होली
की
और
दफ़
के
शोर
खड़कते
हों
तब
देख
बहारें
होली
की
Nazeer Akbarabadi
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बुरा
मनाया
था
हर
आहट
हर
सरगोशी
का
सोचो
कितना
ध्यान
रखा
उसने
ख़ामोशी
का
तुम
इसका
नुक़सान
बताती
अच्छी
लगती
हो
वरना
हम
को
शौक़
नहीं
है
सिगरेट-नोशी
का
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Khurram Afaq
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सफ़र
पीछे
की
जानिब
है
क़दम
आगे
है
मेरा
मैं
बूढ़ा
होता
जाता
हूँ
जवाँ
होने
की
ख़ातिर
Zafar Iqbal
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ग़म
भले
देगी
सरापा
ज़िन्दगी
है
मगर
इक
ही
असासा
ज़िन्दगी
हर
क़दम
पर
इक
तमाशा
ज़िन्दगी
एक
सिक्का
एक
कासा
ज़िन्दगी
रेगज़ारों
में
बगूलों
की
तरह
झूमती
है
बेतहाशा
ज़िन्दगी
साथ
जीने
की
तमन्ना
मौत
है
साथ
मरने
का
इरादा
ज़िन्दगी
ख़ुद
जला
देती
है
अपने
हाथ
से
ओढ़ती
है
जो
लबादा
ज़िन्दगी
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Prasoon
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मैं
तुम्हारी
दस्तरस
से
दूर
हूँ
ख़्वाब
हूँ,आँखों
के
बस
से
दूर
हूँ
इश्क़
ही
से
राबता
रक्खा
फ़क़त
इसलिए
अब
तक
हवस
से
दूर
हूँ
है
गुमाँ
अब
भी
मोहब्बत
का
उसे
मैं
मोहब्बत
के
क़फ़स
से
दूर
हूँ
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Prasoon
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बेख़ुदी
की
ख़ुश्क
राहों
से
मुझे
क्या
शिकायत
कज-कुलाहों
से
मुझे
ऐ
मिरे
क़ातिल
बरा-ए-इश्क़
अब
आ
बचा
ले
ख़ैर-ख़्वाहों
से
मुझे
क्या
मिला
उल्फ़त
पे
ख़ुद
को
ख़र्च
कर
क्या
मिला
वा'दा
निबाहों
से
मुझे
रफ़्ता
रफ़्ता
अब
घुटन
होने
लगी
ज़िन्दगी
तेरी
पनाहों
से
मुझे
बन्दगी
की
जग्ह
है
कू-ए-बुताँ
वास्ता
क्या
ख़ानक़ाहों
से
मुझे
डर
नहीं
लगता
है
तेरे
हिज़्र
से
डर
मगर
लगता
है
आहों
से
मुझे
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Prasoon
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तिरा
नख़रा
उठाया
जा
रहा
है
फ़लक़
को
फिर
सजाया
जा
रहा
है
तिरी
सूरत
उभरती
जा
रही
है
मिरा
चेहरा
दिखाया
जा
रहा
है
कहीं
ख़ामोश
बैठे
हैं
सभी
और
कहीं
क़िस्सा
सुनाया
जा
रहा
है
तिरे
ही
इश्क़
में
लिक्खा
गया
था
जो
नग़्मा
गुनगुनाया
जा
रहा
है
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थे
मज़े
में
हम
ज़मीं
पर
ख़ाक
पर
घूमते
हैं
अब
पर
तेरे
चाक
पर
है
यहाँ
पर
तीरगी
ही
तीरगी
खो
गई
है
रौशनी
अफ़्लाक
पर
बेसबब
आकाश
ख़ाली
हो
गया
चाँद
तारे
लग
गए
पोशाक
पर
दो
घड़ी
को
ही
हँसी
आई
उसे
फिर
उदासी
छा
गई
ग़मनाक
पर
मैं
नहीं
तो,तू
नहीं
तो,कौन
था
लिख
गया
था
इश्क़
जो
इदराक
पर
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