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Prasoon
the maze men ham zameen par khaak par
the maze men ham zameen par khaak par | थे मज़े में हम ज़मीं पर ख़ाक पर
- Prasoon
थे
मज़े
में
हम
ज़मीं
पर
ख़ाक
पर
घूमते
हैं
अब
पर
तेरे
चाक
पर
है
यहाँ
पर
तीरगी
ही
तीरगी
खो
गई
है
रौशनी
अफ़्लाक
पर
बेसबब
आकाश
ख़ाली
हो
गया
चाँद
तारे
लग
गए
पोशाक
पर
दो
घड़ी
को
ही
हँसी
आई
उसे
फिर
उदासी
छा
गई
ग़मनाक
पर
मैं
नहीं
तो,तू
नहीं
तो,कौन
था
लिख
गया
था
इश्क़
जो
इदराक
पर
- Prasoon
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हम
अपने
दुख
को
गाने
लग
गए
हैं
मगर
इस
में
ज़माने
लग
गए
हैं
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Madan Mohan Danish
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जिसे
जो
जी
में
आता
है
सो
लिखता
है
बड़ा
मुश्किल
है
कह
पाना
क़लम
का
दुख
Harsh saxena
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दुनिया
की
फ़िक्र
छोड़,
न
यूँँ
अब
उदास
बैठ
ये
वक़्त
रब
की
देन
है,
अम्मी
के
पास
बैठ
Salman Zafar
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पेड़
को
काटने
वाले
क्या
जाने
दुख
हम
गले
लग
नहीं
सकते
दीवार
से
Neeraj Neer
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ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
Sandeep Thakur
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एक
दुख
ये
के
तू
मिलने
नहीं
आया
मुझ
सेे
एक
दुख
ये
के
उस
दिन
मेरा
घर
ख़ाली
था
Tehzeeb Hafi
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हँसते
हँसते
निकल
पड़े
आँसू
रोते
रोते
कभी
हँसी
आई
Anwar Taban
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हम
तो
बचपन
में
भी
अकेले
थे
सिर्फ़
दिल
की
गली
में
खेले
थे
Javed Akhtar
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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किसी
बे-नाम
रिश्ते
को
नया
इक
नाम
देने
से
बिखर
जाती
हैं
कुछ
नज़्में
फ़क़त
उनवान
देने
से
Prasoon
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बस
उदासी
की
कमी
हो
दिल
मिरे
जा
जहाँ
तेरी
ख़ुशी
हो
दिल
मिरे
जा
यहाँ
की
तीरगी
से
दूर
जा
जा
जहाँ
पर
रौशनी
हो
दिल
मिरे
आब
आँखों
से
बहा
देना
कि
जब
आग
सीने
में
लगी
हो
दिल
मिरे
दर्द
के
सारे
शजर
शादाब
हों
चाक
की
सूरत
हरी
हो
दिल
मिरे
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Prasoon
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हमारे
बाद
सब
आए
यहाँ
पर
हमीं
ने
दश्त
को
वीरां
किया
था
Prasoon
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भला
कैसे
वफ़ा
के
तौर
हैं
ये
भला
कैसी
हमारी
दोस्ती
है
Prasoon
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जो
गुज़रती
उम्र
के
अहबाब
हों
नींद
के
साए
में
झुलसे
ख़्वाब
हों
चाक
की
सूरत
हरी
हो
दिल
मिरे
दर्द
के
सारे
शजर
शादाब
हों
हिज़्र
की
सारी
किताबों
को
पढ़ें
लोग
जो
याँ
वस्ल
को
बेताब
हों
ये
तक़ाज़े
हैं
जुनूँ
के
वास्ते
सब
गली
सहरा
नदी
बे-आब
हों
फिर
न
होगी
दीद
की
हसरत
हमें
गर
कई
चेहरे
तिरे
हम-ताब
हों
या
उसी
की
आग
में
जलते
रहें
या
उसी
दो-चश्म
में
ग़र्क़ाब
हों
नाज़
करना
उस
नदी
के
हुस्न
पर
जिस
नदी
के
सैकड़ों
पायाब
हों
रक़्स
तक
करना
नहीं
आता
हमें
किस
तरह
से
दश्त
में
सैराब
हों
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Prasoon
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