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Prashant Sitapuri
is zamaane ke tareekon se sataaya to gaya hai
is zamaane ke tareekon se sataaya to gaya hai | इस ज़माने के तरीकों से सताया तो गया है
- Prashant Sitapuri
इस
ज़माने
के
तरीकों
से
सताया
तो
गया
है
ग़म
ज़ियादा
हैं
मगर
जाँ
मुस्कुराया
तो
गया
है
- Prashant Sitapuri
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मेरे
तो
ग़म
भी
ज़माने
के
काम
आते
हैं
मैं
रो
पड़ूँ
तो
कई
लोग
मुस्कुराते
हैं
Tariq Qamar
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आधी
से
ज़ियादा
शब-ए-ग़म
काट
चुका
हूँ
अब
भी
अगर
आ
जाओ
तो
ये
रात
बड़ी
है
Saqib lakhanavi
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दुख
कम
मिलें
इस
साल
तुमको
उस
बरस
से
ये
साल
तुमको
हौसला
दे
ये
दु'आ
है
Siddharth Saaz
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तुम्हारे
साथ
था
तो
मैं
गम-ए-उल्फ़त
में
उलझा
था
तुम्हें
छोड़ा
तो
ये
जाना
कि
दुनिया
ख़ूब-सूरत
है
Nirbhay Nishchhal
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हुआ
जौन
को
पढ़
के
मालूम
ये
उदासी
का
भी
इक
कलर
होता
है
Viru Panwar
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मेरे
नादाँ
दिल
उदासी
कोई
अच्छी
शय
नहीं
देख
सूखे
फूल
पर
आती
नहीं
हैं
तितलियाँ
Deepak Vikal
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उदास
लोग
इसी
बात
से
हैं
ख़ुश
कि
चलो
हमारे
साथ
हुए
हादसों
की
बात
हुई
Abhishar Geeta Shukla
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जानता
हूँ
एक
ऐसे
शख़्स
को
मैं
भी
'मुनीर'
ग़म
से
पत्थर
हो
गया
लेकिन
कभी
रोया
नहीं
Muneer Niyazi
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जैसे
उदास
करने
मुझे
आई
ईद
हो
तेरे
बगैर
कैसी
मिरी,
माई
ईद
हो
Sayeed Khan
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हम
ऐसे
लोग
भी
जाने
कहाँ
से
आते
हैं
ख़ुशी
में
रोते
हैं
जो
ग़म
में
मुस्कुराते
हैं
हमारा
साथ
भला
कब
तलक
निभाते
आप
कभी
कभी
तो
हमीं
ख़ुद
से
ऊब
जाते
हैं
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Mohit Dixit
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आप
के
साथ
रहा
जो
भी
रहा
लुत्फ़
ए
हयात
आप
के
बाद
तो
मुश्किल
से
गुज़ारी
ही
गई
Prashant Sitapuri
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अर्जी
है
तेरे
पूरे
हों
नेक
इरादे
सब
मेरी
जाँ
मुबारक
हो
ये
साल-गिरह
तुमको
Prashant Sitapuri
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है
यही
उलझन
,
यही
है
बेबसी
हम
कहाँ
को
और
जाएँ
किस
गली
दिन
गए
जब
थे
दिवाने
हम
तिरे
अब
नहीं
है
यार
कोई
तिश्नगी
सबको
नीचा
ही
दिखाना
है
उसे
और
कर
ही
क्या
सका
है
आदमी
उसको
भूलो
वो
पुरानी
बात
है
अब
तो
अच्छी
कट
रही
है
ज़िन्दगी
भाग
कर
आना
किसी
मैंदान
से
और
क्या
होगी
सिवाए
बुजदिली
जिस
तरह
देखा
है
मैंने
आपको
दुश्मनी
से
भी
बुरी
है
दोस्ती
'जौन'
पीछे
रह
गए
तो
क्या
हुआ
मैं
करूँगा
बात
सब
सेे
काम
की
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Prashant Sitapuri
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कभी
ये
चैन
से
कटते
थे
यारों
मगर
अब
दिन
गुजारे
जा
रहे
हैं
Prashant Sitapuri
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ग़मज़दा
इस
ज़िन्दगी
को
देखते
हैं
और
फिर
अपनी
घड़ी
को
देखते
हैं
ये
सुकूँ
मानो
कि
मर
के
चैन
से
हम
जी
रहे
हर
आदमी
को
देखते
हैं
आप
क्या
क्या
देखते
हैं
आप
जानें
हम
मगर
सादा-दिली
को
देखते
हैं
कुछ
कहूँ
हाँ
यार
अच्छा
ये
बताना
कब
से
मुझ
में
रफ़्तगी
को
देखते
हैं?
आप
भी
सबकी
तरह
हैं
'ऐब-बीनी
आप
भी
मेरी
कमी
को
देखते
हैं
प्यार
क्या
है?,
आप
बस
इतना
समझिये
राम
अपनी
जानकी
को
देखते
हैं
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Prashant Sitapuri
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