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Prashant Sitapuri
hunar samjho ya koi aib samjho isko ke jaañ ham
hunar samjho ya koi aib samjho isko ke jaañ ham | हुनर समझो या कोई ऐब समझो इसको के जाँ हम
- Prashant Sitapuri
हुनर
समझो
या
कोई
ऐब
समझो
इसको
के
जाँ
हम
हो
चाहें
ख़ाक
हासिल
फिर
भी
पुर-उम्मीद
रहते
हैं
- Prashant Sitapuri
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अना
को
अपनी
समझाना
पड़ेगा
बुलाती
है,
तो
फिर
जाना
पड़ेगा
Salman Zafar
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नख़रे
उन
ख़्वाबों
के
बड़े
होंगे
जिनको
वो
रोज़
देखती
होगी
Harsh saxena
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होश
वालों
को
ख़बर
क्या
बे-ख़ुदी
क्या
चीज़
है
इश्क़
कीजे
फिर
समझिए
ज़िंदगी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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उधारी
सर
से
ऊपर
बढ़
चुकी
है
हमारी
जान
जोखिम
में
पड़ी
है
हमीं
अपमान
सहकर
जी
रहे
हैं
अना
की
लाश
पंखे
पर
मिली
है
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Vikas Sahaj
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हुनर
से
काम
लिया
पेंट
ब्रश
नहीं
तोड़ा
बना
लिया
तेरे
जैसा
ही
कोई
रंगों
से
मुझे
ये
डर
है
कि
मिल
जाएगी
तो
रो
दूँगा
मैं
जिस
ख़ुशी
को
तरसता
रहा
हूँ
बरसों
से
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Rahul Gurjar
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निगल
ही
चुका
था
जफ़ा
का
निवाला
अना
फिर
तमाशा
नया
कर
रही
है
Amaan Pathan
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न
हों
अश'आर
में
माअनी
न
सही
ख़ुद
कलामी
का
ज़रिया
ही
सही
तुम
न
नवाज़ो
शे'र
को,
न
सुनाएंगे
ये
मेरा
ज़ाती
नज़रिया
ही
सही
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Unknown
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दर्द
सहने
का
हुनर
तो
पास
सबके
है
मगर
दर्द
कहने
का
हुनर
बस
शायरों
के
पास
है
Divy Kamaldhwaj
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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बा-हुनर
होके
कुछ
न
कर
पाना
रेज़ा-रेज़ा
बिखर
के
ढेह
जाना
मुझको
बेहद
उदास
करता
है
ख़ास
लोगों
का
आम
रह
जाना
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Vishal Bagh
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अच्छी
तरह
से
है
मुझे
दुनिया
का
इल्म,
सो
क्या
काम
है
जो
आप
यूँँ
अपना
बना
रहे
Prashant Sitapuri
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हर
बात
पे
हँसना
तो
पागल
की
निशानी
है
हम
लोग
भी
पागल
हैं
हर
बात
पे
हँसते
हैं
Prashant Sitapuri
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कट
जाता
फिर
ख़ुशी
से
उदासी
का
ये
सफ़र
होते
अगर
हयात
में
तुम
जैसे
दोस्त
और
Prashant Sitapuri
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ता'उम्र
जिनके
वास्ते
उलफ़त
बनायी
है
वो
लोग
मेरे
हिस्से
में
धोखा
बना
रहे
Prashant Sitapuri
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मुयस्सर
हैं
कई
ग़म
ज़िन्दगी
में
और
उन
में
से
ये
ग़म
भी
है
कि
कोई
ग़म
किसी
से
कह
नहीं
सकते
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Prashant Sitapuri
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