kisi goshe men aab-e-chashm ja kar ke bahaata hooñ | किसी गोशे में आब-ए-चश्म जा कर के बहाता हूँ

  - Kabiir
किसीगोशेमेंआब-ए-चश्मजाकरकेबहाताहूँ
इसीइकहीअदासदर्दमैंअपनाछुपाताहूँ
समझोयेकिमेरीज़िंदगीमेंग़मनहींकोई
अलगयेबातहैदुनियाकेआगेमुस्कुराताहूँ
सुकूँइसबातकावोहाथकोतबथामलेताहै
कभीभीजबमैंराह-ए-ज़िंदगीमेंडगमगाताहूँ
चलेजानातुम्हाराखेलजोक़िस्मतकाकहतेहो
अगरयेखेलहैमैंफिरसेक़िस्मतआज़माताहूँ
मिरेअश'आरकोजोतुमसमझतेहोकिरायेके
सुनोमैंशख़्सवोजोइसग़ज़लकाजन्मदाताहूँ
ज़रुरतज़ीस्तकोजबभीकभीराहतकीहोतीहै
कलाम-ए-मीरकोतन्हाईमेंमैंगुनगुनाताहूँ
  - Kabiir
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