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Amanpreet singh
abhii kab tak unhen hi chaahna hai bas
abhii kab tak unhen hi chaahna hai bas | अभी कब तक उन्हें ही चाहना है बस
- Amanpreet singh
अभी
कब
तक
उन्हें
ही
चाहना
है
बस
कहीं
ये
दिल
मिरा
फिर
भर
गया
तो
फिर?
- Amanpreet singh
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सजा
है
प्रेम
का
उपवन
तुम्हीं
से
हमारी
चाह
है
पावन
तुम्हीं
से
सभी
में
प्रेम
देखें
प्रेम
चाहें
मिली
है
ये
मुझे
चितवन
तुम्हीं
से
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Vikas Sahaj
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हम
चाह
कर
भी
टूटते
हैं
हर
दफ़ा
होता
यही
है
इश्क़
का
क्या
क़ायदा
हर
वक़्त
तुम
यूँँ
याद
आते
हो
मुझे
जैसे
नई
दुल्हन
करे
मिस
मायका
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Harsh saxena
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काम
के
बोझ
तले
दब
गए
तो
समझे
हम
लोग
क्यूँँ
चाह
के
भी
दिल
का
नहीं
कर
पाते
Jangveer Singh Rakesh
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ख़ुद
से
भी
मिल
न
सको,
इतने
पास
मत
होना
इश्क़
तो
करना,
मगर
देवदास
मत
होना
देखना,
चाहना,
फिर
माँगना,
या
खो
देना
ये
सारे
खेल
हैं,
इन
में
उदास
मत
होना
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Kumar Vishwas
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उसकी
चाहत
में
भी
इख़लास
नहीं
था
शायद
और
कुछ
हम
भी
उसे
दिल
से
नहीं
चाह
सके
Salman ashhadi sahil
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चाह
थी
दो
जहाँ
की
मगर
देखिए
इक
गली
से
गुज़रता
रहा
उम्र
भर
Ashraf Jahangeer
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मैं
आज
जो
भी
कहूँगा
तुम
सेे
वो
सच
है
जानम
ये
जान
लो
तुम
मिरी
ग़ज़ल
के
हरेक
मिसरे
से
मेरी
चाहत
झलक
रही
है
Amaan Pathan
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इतना
ऊँचा
उड़ना
भी
कुछ
ठीक
नहीं
पाबंदी
लग
जाती
है
परवाज़ों
पर
तुझको
छू
कर
और
किसी
की
चाह
रखे
हैरत
है
और
लानत
है
ऐसे
हाथों
पर
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Varun Anand
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चाहत
में
मर
जाने
वाली
लड़की
हो
तुम
सचमुच
अफ़साने
वाली
लड़की
हो
आख़िरी
बैंच
पे
बैठने
वाला
लड़का
मैं
जाओ
तुम
अव्वल
आने
वाली
लड़की
हो
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Zubair Ali Tabish
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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मिरी
मानो
अभी
ख़ुद
को
बचा
लो
तुम
उसे
अपने
बदन
से
कर
जुदा
लो
तुम
Amanpreet singh
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कभी
मेरे
लिए
बदला
नहीं
वो
हमेशा
से
मगर
ऐसा
नहीं
वो
किसी
के
वास्ते
रोता
भी
था
वो
मगर
मेरे
लिए
रोता
नहीं
वो
अभी
भी
याद
करता
है
किसी
को
मेरा
होकर
भी
क्यूँ
मेरा
नहीं
वो
परिंदों
से
समझ
आया
मुझे
ये
शजर
बस
प्यार
है
प्यारा
नहीं
वो
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Amanpreet singh
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मोहब्बत
जो
समझ
आने
लगी
है
उदासी
नाचने
गाने
लगी
है
उसे
बस
देख
कर
ख़ुश
होता
हूॅं
सो
वो
अब
तस्वीर
से
जाने
लगी
है
हुआ
है
सामना
ऐसा
किसी
से
दग़ाबाज़ी
भी
शरमाने
लगी
है
मेरे
होते
हुए
ऐसी
नहीं
थी
जो
अब
के
जाम
छलकाने
लगी
है
तो
खेला
इश्क़
में
जाता
है
ऐसे
मुझे
भी
अक़्ल
सी
आने
लगी
है
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Amanpreet singh
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बाल
बाँध
कर
वो
दो
लट
निकाल
लेती
है
जान
वान
वो
ऐसे
भी
निकाल
लेती
है
Amanpreet singh
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उसके
इज़हार
में
तो
देरी
है
जाने
को
आई
ट्रेन
मेरी
है
रुख़्सती
हो
चुकी
है
उसकी
पर
जान
अब
भी
मगर
वो
मेरी
है
होंठ
भी
चूमने
थे
उसके
तो
जिसकी
काग़ज़
में
यादें
ढ़ेरी
है
इश्क़
गर
बे-वफ़ाई
करता
है
फिर
ख़ुदाया
ये
चाल
तेरी
है
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Amanpreet singh
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