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Parvez Zaami
aaj aa.e hain vo zaami mere ghar
aaj aa.e hain vo zaami mere ghar | आज आए हैं वो 'ज़ामी' मेरे घर
- Parvez Zaami
आज
आए
हैं
वो
'ज़ामी'
मेरे
घर
बस
तसव्वुर
है
हक़ीक़त
कुछ
नहीं
- Parvez Zaami
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जितने
मर्ज़ी
महँगे
पकवानों
को
खालो
तुम
घर
की
रोटी
तो
फिर
घर
की
रोटी
होती
है
Sarvjeet Singh
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घर
में
झीने
रिश्ते
मैंने
लाखों
बार
उधड़ते
देखे
चुपके
चुपके
कर
देती
है
जाने
कब
तुरपाई
अम्मा
Aalok Shrivastav
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अभी
ज़िंदा
है
माँ
मेरी
मुझे
कुछ
भी
नहीं
होगा
मैं
घर
से
जब
निकलता
हूँ
दु'आ
भी
साथ
चलती
है
Munawwar Rana
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तेरी
यादें
लिपट
जाती
हैं
मुझ
से
घर
पहुँचते
ही
कि
जैसे
बाप
से
आकर
कोई
बच्ची
लिपटती
है
Afzal Ali Afzal
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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लोग
कहते
हैं
कि
इस
खेल
में
सर
जाते
हैं
इश्क़
में
इतना
ख़सारा
है
तो
घर
जाते
हैं
Shakeel Jamali
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इसी
उम्मीद
से
मैं
देखता
हूँ
रास्ता
उसका
वो
आएगा
ज़मी
बंजर
में
इक
दिन
घर
उगाने
को
Kushal "PARINDA"
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नताएज
जब
सर-ए-महशर
मिलेंगे
मोहब्बत
के
अलग
नंबर
मिलेंगे
तुम्हारी
मेज़बानी
के
बहाने
कोई
दिन
हम
भी
अपने
घर
मिलेंगे
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Khurram Afaq
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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हमारे
घर
के
रिश्तों
में
अभी
बारीकियाँ
कम
हैं
भतीजा
मार
खाता
है
तो
चाचा
बोल
देते
हैं
Nirbhay Nishchhal
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मुस्कुरा
के
तू
गर
पिलाए
तो
एक
क़तरा
फ़ुरात
है
साक़ी
Parvez Zaami
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कुछ
न
कुछ
तो
निस्बत
है
बैर
है
या
उल्फ़त
है
हश्र
का
ये
दिन
और
तुम
क्या
हसीं
क़यामत
है
रंज
क्यूँँ
करे
इस
पर
अपनी
अपनी
क़िस्मत
है
कोई
तो
कहे
मुझ
से
आप
से
मोहब्बत
है
मय-कदा
भी
मंदिर
है
साक़ी
उस
की
मूरत
है
ईद
मेरी
हो
जाए
चाँद
की
ज़रूरत
है
ज़ीस्त
तू
जिसे
कहता
चार-दिन
की
मोहलत
है
ज़िंदगी
फ़साना
है
मौत
ही
हक़ीक़त
है
आते
रहना
तुर्बत
पर
आख़िरी
वसीयत
है
ये
ग़ज़ल
नहीं
'ज़ामी'
ज़िंदगी
की
दौलत
है
आ
गया
ख़ुदा
का
ख़त
'ज़ामी'
की
ज़रूरत
है
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Parvez Zaami
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एक
लड़की
है
मुस्कुराती
है
मोजिज़े
हुस्न
के
दिखाती
है
रश्क-ए-महताब
क्यूँँ
न
उस
को
कहूँ
शम्स
की
तरह
जग-मगाती
है
सोचता
हूँ
तिरे
अलावा
तो
ये
क़लम
मुझ
से
रूठ
जाती
है
इक
हमीं
तो
हैं
दीद
के
क़ाबिल
तू
हमीं
से
नज़र
चुराती
है
खुश-ज़बानी
तो
फ़र्ज़
है
उन
पर
जिस
किसी
को
भी
उर्दू
आती
है
'ज़ामी'
कैसे
न
एतिबार
करें
वो
हमारी
ही
क़स
में
खाती
है
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Parvez Zaami
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एक
लड़की
है
मुस्कुराती
है
मोजिज़े
हुस्न
के
दिखाती
है
Parvez Zaami
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तीन
लफ़्ज़ों
की
बात
थी
'ज़ामी'
काश
हम
लब
हिला
दिए
होते
Parvez Zaami
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