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Parvez Zaami
jag ki zeenat hai log kahte hain
jag ki zeenat hai log kahte hain | जग की ज़ीनत है लोग कहते हैं
- Parvez Zaami
जग
की
ज़ीनत
है
लोग
कहते
हैं
तेरी
सूरत
है
लोग
कहते
हैं
चख
के
थोड़ी
सी
देख
लो
वाइज़
मय
में
लज़्ज़त
है
लोग
कहते
हैं
एक
सूरज-मुखी
नहीं
बन
में
घोर
ज़ुल्मत
है
लोग
कहते
हैं
क्या
तुझे
भी
ये
इल्म
है
कि
मुझे
तुझ
से
उल्फ़त
है
लोग
कहते
हैं
बे-वफ़ाई
तो
हुस्न
वालों
की
हस्ब-ए-आदत
है
लोग
कहते
हैं
हर
हसीं
शय
फ़रेब
होती
है
इक
कहावत
है
लोग
कहते
हैं
आओ
सौदा
कर
आज
दें
दिल
का
शुभ-मुहूरत
है
लोग
कहते
हैं
पेशा-ए-इश्क़
कर
तो
लें
'ज़ामी'
थोड़ी
उजरत
है
लोग
कहते
हैं
- Parvez Zaami
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तुझ
तक
आने
का
सफ़र
इतना
भी
आसाँ
तो
न
था
तूने
फेरी
है
नज़र
हम
सेे
जिस
आसानी
से
Mohit Dixit
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ये
वो
क़बीला
है
जो
हुस्न
को
ख़ुदा
माने
यहाँ
पे
कौन
तेरी
बात
का
बुरा
माने
इशारा
कर
दिया
है
आपकी
तरफ़
मैंने
ये
बच्चे
पूछ
रहे
थे
कि
बे-वफ़ा
माने
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Kushal Dauneria
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उस
के
फ़रोग़-ए-हुस्न
से
झमके
है
सब
में
नूर
शम-ए-हरम
हो
या
हो
दिया
सोमनात
का
Meer Taqi Meer
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मैं
हर
शख़्स
के
चेहरे
को
बस
इस
उम्मीद
से
तकता
हूँ
शायद
से
मुझको
दो
आँखें
तेरे
जैसी
दिख
जाएँ
Siddharth Saaz
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कभी
ज़िन्दगी
से
यूँँ
न
चुराया
करो
नज़र
कि
मौजूद
भी
रहो
तो
न
आया
करो
नज़र
S M Afzal Imam
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घूमता
रहता
है
हर
वक़्त
मेरी
आँखों
में
एक
चेहरा
जो
कई
साल
से
देखा
भी
नहीं
Riyaz Tariq
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एक
चेहरा
है
जो
आँखों
में
बसा
रहता
है
इक
तसव्वुर
है
जो
तन्हा
नहीं
होने
देता
Javed Naseemi
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नहीं
है
लब
पे
दिखावे
का
भी
तबस्सुम
अब
हमें
किसी
ने
मुक़म्मल
उदास
कर
दिया
है
Amaan Haider
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एक
ही
बार
नज़र
पड़ती
है
उन
पर
‘ताबिश’
और
फिर
वो
ही
लगातार
नज़र
आते
हैं
Zubair Ali Tabish
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देखने
के
लिए
सारा
आलम
भी
कम
चाहने
के
लिए
एक
चेहरा
बहुत
Asad Badayuni
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महताब
तेरे
रुख़
की
ज़ियारत
का
नाम
है
सिंदूर
तेरी
माँग
का
उल्फ़त
का
नाम
है
Parvez Zaami
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चल
दर-ए-यार
देखा
जाएगा
छोड़
ये
आर
देखा
जाएगा
इक
दफ़ा
कर
ही
लेते
हैं
उस
के
हुस्न
से
प्यार
देखा
जाएगा
इतनी
संजीदगी
भी
ठीक
नहीं
चलिए
सरकार
देखा
जाएगा
डाल
कर
आँख
उस
की
आँखों
में
कर
दो
इज़हार
देखा
जाएगा
फ़िल्म
रोज़-ए-जज़ा
चलेगी
जब
सब
का
किरदार
देखा
जाएगा
मय
की
मिक़दार
तो
नहीं
साक़ी
पर
तिरा
प्यार
देखा
जाएगा
बस
बहुत
सह
लिए
सितम
'ज़ामी'
उठा
तलवार
देखा
जाएगा
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Parvez Zaami
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कार-गर
मेरी
मौत
हो
जाती
चंद
आँसू
बहा
दिए
होते
Parvez Zaami
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तुम
को
मैं
बा-ख़िरद
समझता
था
तुम
तो
अच्छा
सा
मशवरा
देते
Parvez Zaami
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जिन
की
मंज़िल
गुलाब
होती
है
उन
की
राहों
में
ख़ार
होते
हैं
Parvez Zaami
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