aakhir ye roz roz ki vehshat nikal gaii | आख़िर ये रोज़ रोज़ की, वहशत निकल गई

  - Om awasthi
आख़िरयेरोज़रोज़की,वहशतनिकलगई
इकदिनहमारेदिलसे,मोहब्बतनिकलगई
दुनियाकेताम-झाममें,उलझाथाइसकदर
जोचारदिनथीजीनेकी,मोहलतनिकलगई
भरतेथेज़ख़्मछूनेसे,अहल-ए-वफ़ाथेजब
हाथोंसेउनकेअबये,महारतनिकलगई
सोज़-ए-हयातमेंभी,मोहब्बतकीइकगली
एहसानहैजोतेरी,बदौलतनिकलगई
  - Om awasthi
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