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Om awasthi
aakhir ye roz roz ki vehshat nikal gaii
aakhir ye roz roz ki vehshat nikal gaii | आख़िर ये रोज़ रोज़ की, वहशत निकल गई
- Om awasthi
आख़िर
ये
रोज़
रोज़
की,
वहशत
निकल
गई
इक
दिन
हमारे
दिल
से,
मोहब्बत
निकल
गई
दुनिया
के
ताम-झाम
में
,उलझा
था
इस
कदर
जो
चार
दिन
थी
जीने
की
,मोहलत
निकल
गई
भरते
थे
ज़ख़्म
छूने
से
,अहल-ए-वफ़ा
थे
जब
हाथों
से
उनके
अब
ये,
महारत
निकल
गई
सोज़-ए-हयात
में
भी,
मोहब्बत
की
इक
गली
एहसान
है
जो
तेरी,
बदौलत
निकल
गई
- Om awasthi
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उम्र
भर
जिसने
न
माँगा
हो
ख़ुदास
कुछ
भी
उस
ने
बस
तुम
से
मोहब्बत
की
दु'आ
माँगी
है
Shadab Asghar
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यार
इस
में
तो
मज़ा
है
ही
नहीं
कोई
भी
हम
सेे
ख़फ़ा
है
ही
नहीं
इश्क़
ही
इश्क़
है
महसूस
करो
और
कुछ
इसके
सिवा
है
ही
नहीं
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Madhyam Saxena
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ऐ
इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
हाँ
इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
आज
एक
सितमगर
को
हँस
हँस
के
रुलाना
है
Jigar Moradabadi
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हुआ
जो
इश्क़
तो
वो
रोज़
ओ
शब
को
भूल
गए
वो
अपने
इश्क़
ए
नुमाइश
में
सब
को
भूल
गए
कहाँ
वो
दुनिया
में
आए
थे
बंदगी
के
लिए
मिला
सुकून
जहाँ
में
तो
रब
को
भूल
गए
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Hameed Sarwar Bahraichi
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तेरे
बग़ैर
ख़ुदा
की
क़सम
सुकून
नहीं
सफ़ेद
बाल
हुए
हैं
हमारा
ख़ून
नहीं
न
हम
ही
लौंडे
लपाड़ी
न
कच्ची
उम्र
का
वो
ये
सोचा
समझा
हुआ
इश्क़
है
जुनून
नहीं
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Shamim Abbas
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ये
मोहब्बत
है
ये
मर
जाने
से
भी
जाती
नहीं
तू
कोई
क़ैदी
नहीं
है
जो
रिहा
हो
जाएगा
Ali Zaryoun
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सुबूत
है
ये
मोहब्बत
की
सादा-लौही
का
जब
उस
ने
वा'दा
किया
हम
ने
ए'तिबार
किया
Josh Malihabadi
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वहशत-ए-दिल
के
ख़रीदार
भी
नापैद
हुए
कौन
अब
इश्क़
के
बाज़ार
में
खोलेगा
दुकाँ
Ibn E Insha
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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कॉलिज
में
इतवार
से
चिढ़
ने
वाला
इश्क़
ऑफ़िस
में
इतवार
की
राहें
तकता
है
Kumar Kaushal
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दिलों
के
दरमियाँ
जिस
वक़्त
ये
ज़माना
पड़ा
दयार-ए-इश्क
से
बाहर
निकल
के
आना
पड़ा
किसी
को
हक़
था
जहाँ
चाहे
रास्ता
बदले
किसी
को
उम्र
तलक
राब्ता
निभाना
पड़ा
पसीना
हमने
बहाएा
न
जंग
से
पहले
तभी
तो
हमको
लहू
जंग
में
बहाना
पड़ा
कोई
समझता
मेरे
दिल
की
कैफ़ियत
उस
पल
तुम्हारा
अक्स
रह-ए-दिल
से
जब
मिटाना
पड़ा
किसे
ख़बर
की
सुकूँ
की
तलाश
में
हमको
हयात-ए-फ़ानी
में
कितनो
से
दिल
लगाना
पड़ा
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Om awasthi
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ज़िक्र
जब
इस
में
सिर्फ़
तेरा
है
कैसे
कह
दूँ
के
शे'र
मेरा
है
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Om awasthi
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धुएँ
में
उड़
गईं
साँसे
सिगार
ख़त्म
हुआ
इसी
के
साथ
तेरा
इंतिज़ार
ख़त्म
हुआ
बदन
से
करके
अलग
रूह
को
जहाँ
वाले
ये
सोच
लेते
है
दुनिया
से
प्यार
ख़त्म
हुआ
तुम्हारा
हुस्न
भी
फीका
पड़ा
ए
माह-जबीं
मेरा
भी
आशिक़ों
में
अब
शुमार
ख़त्म
हुआ
किसी
ने
होंठों
पे
रख
दी
हैं
उँगलियाँ
अपनी
अब
इस
सेे
आगे
मेरा
इख़्तियार
ख़त्म
हुआ
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Om awasthi
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तवील
इश्क़
की
चाहत
थी
मुख़्तसर
न
मिला
हमारे
जैसों
को
ये
तोहफ़ा
उम्र
भर
न
मिला
तमाम
उम्र
उलझता
रहा
मैं
दुनिया
से
समझ
सके
जो
मुझे
,ऐसा
हम-नज़र
न
मिला
ये
सोचता
हूँ
के,
क्या
ही
बिगाड़
लूँगा
तेरा
तू
इस
दफ़ा
भी
मुझे
वक़्त
पर
अगर
न
मिला
उदासियाँ
हैं
फ़क़त
अर्ज़-ए-दिल
में
फैली
हुई
वो
शाख़
हूँ
मैं
जिसे
,कोई
भी
समर
न
मिला
किसी
के
दिल
में
मुकम्मल
क़याम
करने
को
कोई
भी
नुस्ख़ा
मुहब्बत
से
कार-गर
न
मिला
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Om awasthi
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इस
सेे
पहले
कि
मेरा
ज़ेहन
सँभाले
मुझको
ये
तेरी
सादा-दिली
मार
न
डाले
मुझको
Om awasthi
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