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Nikhil Tiwari 'Nazeel'
gharo men purane dariche milenge
gharo men purane dariche milenge | घरों में पुराने दरीचे मिलेंगे
- Nikhil Tiwari 'Nazeel'
घरों
में
पुराने
दरीचे
मिलेंगे
वहाँ
से
दिखे
तो
बगीचे
मिलेंगे
हवा
का
हवाला
बताया
गया
है
परिंदे
सलाख़ों
के
पीछे
मिलेंगे
दुबारा
गया
था
वही
राह
पर
तू
कहा
था
कि
आगे
गलीचे
मिलेंगे
सितारों
की
लाशें
छुपाते
रहे
ना
निगाहें
कभी
ये
न
भींचे
मिलेंगे
ख़ुदा
ने
बनाया
सजाया
जहाँ
को
बहाना
बनाया
कि
नीचे
मिलेंगे
सुकूँ
ही
इसी
बात
से
है
कि
मेरे
मिरे
नाम
पर
तीर
खींचे
मिलेंगे
- Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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अक्सर
ही
ज़ख़्म
इश्क़
में
पाले
हैं
औरतें
पर
कितने
टूटे
मर्द
सँभाले
हैं
औरतें
Abhishar Geeta Shukla
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ये
बात
अभी
सबको
समझ
आई
नहीं
है
दीवाना
है
दीवाना
तमन्नाई
नहीं
है
दिल
मेरा
दुखाकर
ये
मुझे
तेरा
मनाना
मरहम
है
फ़क़त
ज़ख़्म
की
भरपाई
नहीं
है
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Vikram Gaur Vairagi
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सहर
की
आस
लगाए
हुए
हैं
वो
कि
जिन्हें
कमान-ए-शब
से
चले
तीर
की
ख़बर
भी
नहीं
Abhishek shukla
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तेरे
लगाए
हुए
ज़ख़्म
क्यूँँ
नहीं
भरते
मेरे
लगाए
हुए
पेड़
सूख
जाते
हैं
Tehzeeb Hafi
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पुरानी
चाहत
के
ज़ख़्म
अब
तक
भरे
नहीं
हैं
और
एक
लड़की
पड़ी
है
पीछे
बड़े
जतन
से
Ashu Mishra
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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ठीक
से
ज़ख़्म
का
अंदाज़ा
किया
ही
किसने
बस
सुना
था
कि
बिछड़ते
हैं
तो
मर
जाते
हैं
Shariq Kaifi
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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जितने
भी
हैं
ज़ख़्म
तुम्हारे
सिल
देगी
होटल
में
खाने
का
आधा
बिल
देगी
सीधे
मुँह
जो
बात
नहीं
करती
है
जो
तुमको
लगता
है
वो
लड़की
दिल
देगी
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Shadab Asghar
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किस
ने
हमारे
शहर
पे
मारी
है
रौशनी
हर
इक
मकाँ
के
ज़ख़्म
से
जारी
है
रौशनी
Nomaan Shauque
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फिर
रोज़
की
तरह
का
वही
ग़म
समेटना
ऊपर
से
इस
शराब
से
उक्ता
गया
था
मैं
Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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मेरी
ही
तरह
बन
कर
के
देख
लिया
तू
ने
ये
लोग
तुझे
भी
अब
अहबाब
नहीं
कहते
Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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जिस
रोज़
हराफ़त
से
आईन
बने
होंगे
गुस्ताख़
सितमगर
भी
ज़ोरीन
बने
होंगे
इस
शहर
कि
सड़कों
पे
हर
एक
मुहाजिर
भी
बर्बाद
नज़ारों
के
शौक़ीन
बने
होंगे
ये
लोग
ख़ुदास
यूँँ
अब
आँख
मिलाते
हैं
सोचो
तो
भला
कैसे
बे-दीन
बने
होंगे
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Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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बदन
सड़ता
रहे
किरदार
उठ
जाए
ज़मीन-ए-शोर
से
फ़नकार
उठ
जाए
छुपा
लेता
हूँ
कुछ
बातें
ख़ुदाओं
की
वगरना
हर
तरफ़
तलवार
उठ
जाए
बशर
ऐसी
सनक
से
चाल
चल
कोई
दिलों
के
बीच
से
दीवार
उठ
जाए
बुलंद
आवाज़
की
तासीर
ऐसी
है
अगर
दिल
से
सुने
बीमार
उठ
जाए
हमारा
तख़्त
लौटा
दीजिएगा
जब
हमीं
से
गर
सही
हक़दार
उठ
जाए
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Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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इन
दयारों
में
जो
भी
बचे
थे
वो
तिरी
बात
में
आ
चुके
थे
क़त्ल
करता
रहा
तू
ही
मुफ़सिद
ख़ून
से
हाथ
मेरे
सने
थे
भर
गया
तू
बहुत
नफ़रतों
से
आज
तेरी
तरफ़
आइने
थे
अब
समझ
आ
रहा
है
दु'आ
में
तुम
मिरी
मौत
क्यूँँ
माँगते
थे
इक
ख़ुदा
आ
गया
है
ज़मीं
पर
इस
क़दर
आसमाँ
घुट
रहे
थे
नाम
आए
न
तेरा
ज़बाँ
पे
बात
ग़ैरों
की
हम
काटते
थे
जो
भी
किरदार
पर
लिख
रहा
हूँ
ये
सभी
हाल
के
तब्सिरे
थे
दास्ताँ
है
हमारी
तुम्हारी
सब
जिसे
सौ
दफ़ा
सुन
चुके
थे
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