dard-o-gham hardam mujhe apni taraf kyuuñ kheenchta hai | दर्द-ओ-ग़म हरदम मुझे अपनी तरफ़ क्यूँ खींचता है?

  - Vikas Shah musafir
दर्द-ओ-ग़महरदममुझेअपनीतरफ़क्यूँखींचताहै?
जबकिसीसेवास्ता-दर-वास्ताहीनइँरखाहै
मैंअभीतकहरमुसीबतझेलताआयातभीतो
अबमुझेहदसेज़ियादाहीसतायाजारहाहै
क्याकरूँँमैंजानमेरीमुझसेछीनीजारहीहै
औरसबयेपूछतेहैंमुझकोफिरसेक्याहुआहै
मुझकोतेरेहुस्नपेइतनीरसाईतोनहींहै
बसमुझेतुझमेंज़खीराख़ूबियोंकाहीदिखाहै
इश्क़कीइसक़ैदसेमुझकोरिहाईकबमिलेगी?
देशतोआज़ादकबकाबंदिशोंसेहोचुकाहै
  - Vikas Shah musafir
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