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Asif gauri
baddua kyun karen kisi ke li.e
baddua kyun karen kisi ke li.e | बद्दुआ क्यूँँ करें किसी के लिए
- Asif gauri
बद्दुआ
क्यूँँ
करें
किसी
के
लिए
लोग
मरते
हैं
ज़िंदगी
के
लिए
- Asif gauri
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समझ
से
काम
जो
लेता
हर
एक
बशर
'ताबाँ'
न
हाहा-कार
ही
मचते
न
घर
जला
करते
Anwar Taban
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इसी
लिए
तो
यहाँ
अब
भी
अजनबी
हूँ
मैं
तमाम
लोग
फ़रिश्ते
हैं
आदमी
हूँ
मैं
Bashir Badr
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फूल
कर
ले
निबाह
काँटों
से
आदमी
ही
न
आदमी
से
मिले
Khumar Barabankvi
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रफ़्ता
रफ़्ता
सब
कुछ
समझ
गया
हूँ
मैं
लोग
अचानक
टैरेस
से
क्यूँ
कूद
गए
Shadab Asghar
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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मैं
चीख़ता
रहा
कुछ
और
भी
है
मेरा
इलाज
मगर
ये
लोग
तुम्हारा
ही
नाम
लेते
रहे
Anjum Saleemi
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ये
लोग
कौन
हैं
आख़िर
कहाँ
से
आते
हैं
जो
जिस्म
नोच
के
फिर
बेटियाँ
जलाते
हैं
Shajar Abbas
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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इश्क़
जब
तक
न
कर
चुके
रुस्वा
आदमी
काम
का
नहीं
होता
Jigar Moradabadi
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अलमास
धरे
रह
जाते
हैं
बिकता
है
तो
पत्थर
बिकता
है
अजनास
नहीं
इस
दुनिया
में
इंसाँ
का
मुक़द्दर
बिकता
है
'खालिद
सज्जाद'
सुनार
हूँ
मैं
इस
ग़म
को
ख़ूब
समझता
हूँ
जब
बेटा
छुप
कर
रोता
है
तब
माँ
का
ज़ेवर
बिकता
है
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Khalid Sajjad
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उसे
मुद्दत
से
जी
भर
के
नहीं
देखा
मुझे
अब
वो
नज़र
आए
तो
अच्छा
है
Asif gauri
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फ़क़त
अब
तो
दिलासा
रह
गया
है
बताओ
क्या
हमारा
रह
गया
है
निकल
कर
रूह
कब
की
जा
चुकी
है
बदन
पंखे
से
लटका
रह
गया
है
बग़ैर
उसके
मरा
मैं
भी
नहीं
और
बिछड़
कर
वो
भी
ज़िंदा
रह
गया
है
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Asif gauri
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तुम
मेरे
थे
किसी
ज़माने
में
बस
यही
काफ़ी
है
ख़ुशी
के
लिए
Asif gauri
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कभी
था
वो
मेरा
जो
अब
है
नहीं
पर
मेरा
जब
वो
था
तब
किसी
का
नहीं
था
मेरी
बात
मानो
चलो
भी
तुम
आसिफ़
वो
जैसा
भी
था
पर
तुम्हारा
नहीं
था
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Asif gauri
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