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Mohit Subran
zara se shak pe hua khatm raabta lekin
zara se shak pe hua khatm raabta lekin | ज़रा से शक पे हुआ ख़त्म राब्ता लेकिन
- Mohit Subran
ज़रा
से
शक
पे
हुआ
ख़त्म
राब्ता
लेकिन
ज़रा
सा
शक
न
हुआ
ख़त्म
दरमियाँ
से
मगर
- Mohit Subran
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बाक़ी
नहीं
रहा
है
कोई
रब्त
शहरस
यानी
कि
ख़ुश
रहेंगे
यहाँ
ख़ुश
रहे
बग़ैर
pankaj pundir
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अपना
रिश्ता
ज़मीं
से
ही
रक्खो
कुछ
नहीं
आसमान
में
रक्खा
Jaun Elia
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धूप
भी
आराम
करती
थी
जहाँ
अपना
ऐसी
छाँव
से
नाता
रहा
Madan Mohan Danish
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कौन
सी
दीवार
है
मौजूद
इस
रिश्ते
में
'साज़'
क्यूँँ
नहीं
रो
सकते
हम
अपने
पिता
के
सामने
Siddharth Saaz
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प्यार
का
रिश्ता
ऐसा
रिश्ता
शबनम
भी
चिंगारी
भी
यानी
उन
सेे
रोज़
ही
झगड़ा
और
उन्हीं
से
यारी
भी
Ateeq Allahabadi
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किस
वास्ते
लिक्खा
है
हथेली
पे
मिरा
नाम
मैं
हर्फ़-ए-ग़लत
हूँ
तो
मिटा
क्यूँँ
नहीं
देते
Hasrat Jaipuri
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दिल
की
ख़ातिर
एक
रिश्ते
को
बचाने
के
लिए
आग
मैंने
ही
लगा
ली
ख़ुद
मिरे
घरबार
में
Shashank Shekhar Pathak
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क्या
जाने
किस
ख़ता
की
सज़ा
दी
गई
हमें
रिश्ता
हमारा
दार
पे
लटका
दिया
गया
शादी
में
सब
पसंद
का
लाया
गया
मगर
अपनी
पसंद
का
उसे
दूल्हा
नहीं
मिला
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Afzal Ali Afzal
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पैसा
कमाने
आते
हैं
सब
राजनीति
में
आता
नहीं
है
कोई
भी
खोने
के
वास्ते
छम्मो
का
मुजरा
सुनते
हैं
नेता
जो
रात
भर
संसद
भवन
में
आते
हैं
सोने
के
वास्ते
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Paplu Lucknawi
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मेरी
जवानी
को
कमज़ोर
क्यूँ
समझते
हो
तुम्हारे
वास्ते
अब
भी
शबाब
बाक़ी
है
ये
और
बात
है
बोतल
ये
गिर
के
टूट
गई
मगर
अभी
भी
ज़रा
सी
शराब
बाक़ी
है
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Paplu Lucknawi
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नहीं
रहती
है
पहली
जीत
दिल
को
याद
आख़िर
तक
मगर
वो
हार
पहली
दिल
से
आख़िर
तक
नहीं
जाती
Mohit Subran
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लुभाता
है
किसे
दिल-दार
लोगों
का
यहाँ
पे
दिल
यहाँ
दिल
भी
सभी
को
माल-दारों
का
लुभाता
है
Mohit Subran
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आख़िरश
कोई
इशारा
किसी
को
क्यूँ
देंगे
जब
न
सह
पाएँगे
चुप-चाप
चले
जाएँगे
Mohit Subran
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सफ़र
कैसे
कटा
उन
रास्तों
को
कौन
गिनता
है
तुम्हारे
सर
पे
बीते
हादसों
को
कौन
गिनता
है
सभी
रखते
हैं
गिन
के
उँगलियों
पर
कामयाबी
को
उठाई
हैं
जो
तुमने
मुश्किलों
को
कौन
गिनता
है
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Mohit Subran
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हौले-हौले
गुज़र
रहा
हूँ
मैं
वक़्त
से
पहले
मर
रहा
हूँ
मैं
ज़िन्दगी
बस
बसर
की
हो
जिसने
एक
ऐसा
बशर
रहा
हूँ
मैं
फिर
वो
कोई
भी
शख़्स
क्यूँ
न
सही
हर
किसी
को
अखर
रहा
हूँ
मैं
जाने
क्या
सूझी
है
जो
शिद्दत
से
ख़ुद
को
बर्बाद
कर
रहा
हूँ
हाए
ये
सच
वहाँ
तबाही
रही
आज
तक
भी
जिधर
रहा
हूँ
मैं
न
गिनूँ
इस
जहान
को
फिर
तो
हर
जगह
कार-गर
रहा
हूँ
मैं
आख़िरश
क्या
है
वो
जो
खोया
नहीं
फिर
ये
किस
डर
से
डर
रहा
हूँ
मैं
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Mohit Subran
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