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Mohit Subran
jyuun yaadon men vo aate hain
jyuun yaadon men vo aate hain | ज्यूँँ यादों में वो आते हैं
- Mohit Subran
ज्यूँँ
यादों
में
वो
आते
हैं
त्यूँँ
पलकों
से
गिर
जाते
हैं
मेरे
ही
बोए
आँसू
हैं
हर
शब
जो
ये
उग
आते
हैं
- Mohit Subran
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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मेरे
नादाँ
दिल
उदासी
कोई
अच्छी
शय
नहीं
देख
सूखे
फूल
पर
आती
नहीं
हैं
तितलियाँ
Deepak Vikal
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मुझे
रोना
नहीं
आवाज़
भी
भारी
नहीं
करनी
मोहब्बत
की
कहानी
में
अदाकारी
नहीं
करनी
Afzal Khan
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मैं
चाहता
था
मुझ
सेे
बिछड़
कर
वो
ख़ुश
रहे
लेकिन
वो
ख़ुश
हुआ
तो
बड़ा
दुख
हुआ
मुझे
Umair Najmi
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यूँँ
ही
थोड़ी
मेरी
गज़लों
में
इतना
दुख
होता
है
इस
दुनिया
ने
हम
लड़कों
से
रोने
का
हक़
छीना
है
Harsh saxena
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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हम
तो
बचपन
में
भी
अकेले
थे
सिर्फ़
दिल
की
गली
में
खेले
थे
Javed Akhtar
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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ज़रूरत
क्या
तिजारत-गार
को
ख़ुद
हाथ
रँगने
की
ठिकाने
कुछ
लगाना
हो
अगर
सरकार
बैठी
है
Mohit Subran
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तिरे
इस
चाँद
से
माथे
से
फिसला
माँग-टीका
तिरे
लब
को
न
छू
पाई
कभी,
वो
लाली
हूँ
मैं
तिरी
पाज़ेब
से
टूटा
हुआ
बद-बख़्त
घुंघरू
तिरे
ही
कान
की
खोई
हुई
इक
बाली
हूँ
मैं
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Mohit Subran
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उम्र
लग-भग
है
अब
ढही
जाती
इक
ख़लिश
दिल
में
पर
रही
जाती
एक
हद
होती
है
कि
सहने
की
अब
नहीं
ये
घुटन
सही
जाती
मन
को
भी
पढ़ने
की
करो
कोशिश
बात
हर
इक
नहीं
कही
जाती
कैसे
गुज़रेंगे
ख़ुश्कियों
के
दिन
ये
नमी
आँख
से
बही
जाती
तारी
रहती
ये
बे-ख़ुदी
लेकिन
ज़ेहन
से
मेरे
आगही
जाती
जो
कही
जा
चुकी,
सुनी
जा
चुकी
काश
वो
बात
अन-कही
जाती
बस
कि
नाम-ओ-निशान
मिट
जाए
अब
कि
ये
चाह
भी
रही
जाती
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Mohit Subran
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दु'आ
करता
हूँ
मैं
ही
माँग
सिंदूरी
रहे
तेरी
मुझी
से
और
तिरा
सिंदूर
ये
देखा
नहीं
जाता
Mohit Subran
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वक़्त
ने
छोड़ा
न
इक
हाथ
भी
इन
हाथों
में
ज़िन्दगी
तुझ
को
गुज़ारूँ
तो
गुज़ारूँ
कैसे
Mohit Subran
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