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Mohammed Ibrahim
safar ghar hai thikaana hai
safar ghar hai thikaana hai | सफ़र घर है ठिकाना है
- Mohammed Ibrahim
सफ़र
घर
है
ठिकाना
है
हमें
घर
जो
बनाना
है
सभी
को
है
हँसाना
भी
सभी
का
ग़म
उठाना
है
गया
बचपन
किताबों
में
जवानी
में
कमाना
है
बहन
भी
है
हमें
जिस
को
पढ़ाना
है
सिखाना
है
हाँ
बाबा
और
अम्मा
को
हमें
हज
भी
कराना
है
हूँ
बेटा
और
होने
का
फ़राइज़
है
निभाना
है
- Mohammed Ibrahim
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काश
ऐसी
भी
कोई
सूरत
हो
ख़्वाब
है
जो
मिरा
हक़ीक़त
हो
सोचता
हूँ
तो
दिल
धड़कता
है
तुम
मिरी
साँस
की
सहूलत
हो
तुम
ही
को
देख
कर
गुज़ारी
है
ज़िंदगी
ऐसी
जिस
सेे
वहशत
हो
ख़ुश्की
लब
पर
नहीं
तिरे
जँचती
चूम
लूँ
मैं
अगर
इजाज़त
हो
हम
नहीं
जौन
पर
न
जाने
क्यूँँ
तुम
मिरी
आख़िरी
मोहब्बत
हो
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Mohammed Ibrahim
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कि
हम
तुम
और
ये
बहरें
भी
क़ातिल
हैं
कि
हमने
क़त्ल
कर
डाला
ख़यालों
का
ग़ज़ल
बस
आज
होती
है
मुहब्बत
पर
ग़ज़ल
तो
एक
मैदाँ
था
सवालों
का
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Mohammed Ibrahim
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कभी
सच
तो
कभी
धोका
रहा
है
हमेशा
दिल
को
ये
ख़तरा
रहा
है
अजब
है
ना
के
जिसने
साथ
छोड़ा
निभाए
कोई
तो
यादआ
रहा
है
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Mohammed Ibrahim
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मुझ
सेे
दिन
रात
ये
आईना
कर
रहा
बात
ये
आईना
टूट
ही
जाएँगे
लोग
वो
जिन
की
है
ज़ात
ये
आईना
जब
हँसू
तो
हँसे
साथ
ये
रोए
भी
साथ
ये
आईना
भूल
जो
जाऊँ
तो
सामने
लाए
औक़ात
ये
आईना
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Mohammed Ibrahim
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कहाँ
ढूँढते
हो
मुझे
इस
जहाँ
में
मैं
खोया
हूँ
ख़ुद
की
ही
इक
दास्ताँ
में
जो
ख़्वाबों
से
निकला
हक़ीक़त
को
देखा
मिरे
पास
कुछ
भी
न
था
इस
जहाँ
में
कोई
पूछ
बैठे
तो
क्या
हाल
लिख
दूँ
बस
इक
चुप
है
लिपटी
हुई
दास्ताँ
में
कभी
अश्क
बन
कर
बहा
ख़ुद
से
बाहर
कभी
क़ैद
था
मैं
ही
अपनी
अज़ाँ
में
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Mohammed Ibrahim
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