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Mohammed Ibrahim
kaash aisi bhi koii soorat ho
kaash aisi bhi koii soorat ho | काश ऐसी भी कोई सूरत हो
- Mohammed Ibrahim
काश
ऐसी
भी
कोई
सूरत
हो
ख़्वाब
है
जो
मिरा
हक़ीक़त
हो
सोचता
हूँ
तो
दिल
धड़कता
है
तुम
मिरी
साँस
की
सहूलत
हो
तुम
ही
को
देख
कर
गुज़ारी
है
ज़िंदगी
ऐसी
जिस
सेे
वहशत
हो
ख़ुश्की
लब
पर
नहीं
तिरे
जँचती
चूम
लूँ
मैं
अगर
इजाज़त
हो
हम
नहीं
जौन
पर
न
जाने
क्यूँँ
तुम
मिरी
आख़िरी
मोहब्बत
हो
- Mohammed Ibrahim
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उस
के
चेहरे
पे
जो
तिल
है
वो
सितारा
सा
लगे
एक
लम्हा
रुक
के
देखो
चाँद
सारा
सा
लगे
हुस्न
जब
पर्दा
उठाए
धड़कनें
मदहोश
हों
हर
अदा
उस
की
मुझे
अब
इक
नज़ारा
सा
लगे
शहर
की
गलियों
में
जब
आईना
बन
कर
वो
चले
हर
नज़र
उस
पर
ठहर
कर
बेकरारा
सा
लगे
मेरे
अफ़्साने
में
शामिल
है
जो
उसका
तिल
ही
है
उस
के
होंठों
का
तबस्सुम
राज़दारा
सा
लगे
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तू
हमारा
है
गुमाँ
भी
छोड़
देंगे
बाद
उसके
ये
जहाँ
भी
छोड़
देंगे
है
मोहब्बत
क़ैद
कोई
ये
नहीं
सो
वो
कहे
छोड़ो
जहाँ
भी
छोड़
देंगे
लौट
आओ
तुम
कभी
तो
इसलिए
हम
पैरों
के
अपने
निशाँ
भी
छोड़
देंगे
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हटा
या
ख़ुद
ही
नक़्श-ए-पा
हमारा
चले
इन
पे
नहीं
बेटा
हमारा
फटे
जब
पैरहन
तब
याद
आया
उसे
सर
को
ढके
रखना
हमारा
चले
वो
जाए
जी
ले
ज़िंदगी
को
ख़ुदा
पे
छोड़
दे
जीना
हमारा
बड़ा
बनता
है
घर
का
है
बड़ा
पर
अभी
भी
दिल
है
ये
बच्चा
हमारा
मरेंगे
साथ
हम
भी
और
दिल
भी
कि
बनता
ही
नहीं
बचना
हमारा
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हवा
चल
रही
है
फ़ज़ा
कुछ
कहेगी
उदासी
हमारी
सदा
कुछ
कहेगी
न
बोले
कोई
और
आँखें
भी
ख़ामोश
मगर
ख़ामुशी
की
सदा
कुछ
कहेगी
तुम्हें
सोचते
ही
निकलती
है
आहट
मोहब्बत
की
ये
इंतिहा
कुछ
कहेगी
बिछड़ने
का
लम्हा
है
पत्थर
सा
लेकिन
यही
बेबसी
ये
दु'आ
कुछ
कहेगी
मैं
तन्हा
सही
पर
यक़ीं
है
मुझे
ये
तेरी
याद
मुझ
सेे
वफ़ा
कुछ
कहेगी
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नज़र
से
नज़र
की
मिली
जब
कहानी
सुनाते
रहे
आँसुओं
की
ज़बानी
सुकूँ
है
तिरी
बात
में
इस
क़दर
क्यूँ
कि
लगती
है
जैसे
कोई
इक
निशानी
न
तू
पास
फिर
भी
है
महसूस
हर
दम
तिरी
याद
मेरी
हुई
मेहरबानी
चलो
छोड़
दें
ये
गिला
वक़्त
से
अब
कि
मिलती
नहीं
है
वफ़ा
रातपानी
मैं
चुप
हूँ
मगर
ये
तिरी
याद
बोले
है
ख़ामोशियों
में
भी
इक
सुर
बयानी
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