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Talib akbarabadi
mujhe is tarah se giraaya gaya hai
mujhe is tarah se giraaya gaya hai | मुझे इस तरह से गिराया गया है
- Talib akbarabadi
मुझे
इस
तरह
से
गिराया
गया
है
कि
जैसे
दिए
को
बुझाया
गया
है
अकेले
बचे
हो
फ़क़त
इस
वजह
से
शजर
से
परिंदा
उड़ाया
गया
है
रुका
ही
नहीं
है
कोई
कुर्ब
मेरे
रुका
गर
है
कोई
रुलाया
गया
है
उसे
ढूंढता
हूँ
दिनों
रात
अब
मैं
जिसे
रात
दिन
बस
सताया
गया
है
कभी
आग
जिसने
बुझायी
थी
मेरी
ख़ुदाया
उसे
ही
जलाया
गया
है
बरोज़े
क़यामत
शफ़ाअत
करेंगे
वही
जिनको
तन्हा
सताया
गया
है
कहद
आ
रहे
हैं
कहीं
ज़लज़ले
भी
फ़क़ीरों
को
दर
से
उठाया
गया
है
- Talib akbarabadi
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हम
मिल
के
आ
गए
मगर
अच्छा
नहीं
लगा
फिर
यूँँ
हुआ
असर
कि
घर
अच्छा
नहीं
लगा
इक
बार
दिल
में
तुझ
सेे
जुदाई
का
डर
बना
फिर
दूसरा
कोई
भी
डर
अच्छा
नहीं
लगा
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Shriyansh Qaabiz
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ज़िंदगी
मेरी
मुझे
क़ैद
किए
देती
है
इस
को
डर
है
मैं
किसी
और
का
हो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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कुछ
न
था
मेरे
पास
खोने
को
तुम
मिले
हो
तो
डर
गया
हूँ
मैं
Nomaan Shauque
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सखियों
संग
रँगने
की
धमकी
सुनकर
क्या
डर
जाऊँगा
तेरी
गली
में
क्या
होगा
ये
मालूम
है
पर
आऊँगा
Kumar Vishwas
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गर
बाज़ी
इश्क़
की
बाज़ी
है,
जो
चाहो
लगा
दो
डर
कैसा
गर
जीत
गए
तो
क्या
कहना,
हारे
भी
तो
बाज़ी
मात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
Rajesh Reddy
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शे'र
दर-अस्ल
हैं
वही
'हसरत'
सुनते
ही
दिल
में
जो
उतर
जाएँ
Hasrat Mohani
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सब
ने
माना
मरने
वाला
दहशत-गर्द
और
क़ातिल
था
माँ
ने
फिर
भी
क़ब्र
पे
उस
की
राज-दुलारा
लिक्खा
था
Ahmad Salman
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राम
होने
में
या
रावण
में
है
अंतर
इतना
एक
दुनिया
को
ख़ुशी
दूसरा
ग़म
देता
है
हम
ने
रावण
को
बरस
दर
बरस
जलाया
है
कौन
है
वो
जो
इसे
फिर
से
जनम
देता
है
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Kumar Vishwas
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उसे
ज़ियादा
ज़रूरत
थी
घर
बसाने
की
वो
आ
के
मेरे
दर-ओ-बाम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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ऐश
सब
ज़माने
के
दस्तयाब
हैं
लेकिन
एक
शय
नहीं
मिलती
बस
सुकूँ
नहीं
मिलता
Talib akbarabadi
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छोड़ना
उसे
था
पर
छोड़
ही
न
पाया
मैं
क्योंकि
यार
उस
जैसा
दूसरा
नहीं
मिलता
Talib akbarabadi
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क्या
हुआ
बताओ
तो
साथ
हादसा
उसके
बारिशें
बरसती
हैं
भीगता
नहीं
मिलता
Talib akbarabadi
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वो
शाम
भी
कुछ
यूँँ
ही
थी
जब
वो
गया
था
छोड़
कर
मेरा
दिसंबर
तो
कई
बरसों
तलक
क़ायम
रहा
Talib akbarabadi
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वही
पीछे
खड़ा
है
मुक़्तदी
बनकर
जो
बहकाता
रहा
हर
पल
बदी
बनकर
हमेशा
ख़ुद
को
कहता
हूँ
ज़रा
थम
जा
करेगा
क्या
रवाँ
होती
नदी
बनकर
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Talib akbarabadi
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