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Manoj Devdutt
mohabbat men maqaam hai bichadna bhi
mohabbat men maqaam hai bichadna bhi | मोहब्बत में मक़ाम है बिछड़ना भी
- Manoj Devdutt
मोहब्बत
में
मक़ाम
है
बिछड़ना
भी
मुकम्मल
ये
मक़ाम
पा
चुके
हैं
हम
- Manoj Devdutt
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अब
मौसम-ए-बहार
पर
ग़ज़ल
लिखी
है
फिर
अपने
एक
यार
पर
ग़ज़ल
लिखी
है
तेरी
पुकार
मेरी
रूह
तक
गई
थी
फिर
बस
तेरी
पुकार
पर
ग़ज़ल
लिखी
है
तुम
सेे
जुदा
नहीं
हुआ
अभी
तलक
मैं
तुम्हारे
फिर
ख़ुमार
पर
ग़ज़ल
लिखी
है
पहले
लिखी
रक़ीब
पर
ग़ज़ल
हम
ही
नें
बस
फिर
हम
ही
ने
प्यार
पर
ग़ज़ल
लिखी
है
इक
वा'दा
तूने
जो
मनोज
से
किया
था
बस
उसके
इंतिज़ार
पर
ग़ज़ल
लिखी
है
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ग़ज़लगो
को
ग़ज़ल
समझा
रहे
हो
तुम
पता
है
क्या
किसे
बतला
रहे
हो
तुम
जहाँ
जब
बह
रहा
है
इक
तरफ़
तो
फिर
जहाँ
से
ही
अलग
क्यूँँ
जा
रहे
हो
तुम
पता
है
मैं
अभी
पीता
नहीं
फिर
भी
मुझी
को
जाम
क्यूँँ
पकड़ा
रहे
हो
तुम
दिखाकर
ख़्वाब
अच्छे
राह
में
मेरी
नुकीले
तार
क्यूँँ
बिछवा
रहे
हो
तुम
भले
अपनी
ख़ुशी
हम
सेे
छिपा
लेना
अभी
ग़म
क्यूँँ
छिपाते
जा
रहे
हो
तुम
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Manoj Devdutt
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इक
बाप
ने
ख़ुद
की
फ़ज़ीहत
की
तब
जाके
ही
अपनी
वसीयत
की
Manoj Devdutt
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अब
लोग
जो
मौन
रहते
हैं
आदम
यहाँ
कौन
रहते
हैं
टूटे
दिलों
में
हमेशा
से
इक
शख़्स
बस
जौन
रहते
हैं
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ख़ुदा
के
नाम
पर
लड़वा
रहे
नेता
हमें
कितना
ग़लत
समझा
रहे
नेता
ग़रीबी
को
मिटाने
निकले
थे
वो
पर
ग़रीबों
को
मिटाते
जा
रहे
नेता
कभी
हक़
ये
अमीरों
का
नहीं
खाते
सभी
हक़
मुफ़्लिसों
का
खा
रहे
नेता
सभी
के
हाथ
जोड़े
जीतने
को
बस
सभी
से
पैर
फिर
छिलवा
रहे
नेता
पढ़े
ख़ुद
है
नहीं
लेकिन
पढ़ाना
क्या
हटाना
क्या
है
ये
बतला
रहे
नेता
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Manoj Devdutt
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