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Lalit Mohan Joshi
suno yaar khatra vo ab tal gaya
suno yaar khatra vo ab tal gaya | सुनो यार ख़तरा वो अब टल गया
- Lalit Mohan Joshi
सुनो
यार
ख़तरा
वो
अब
टल
गया
मैं
आख़िर
जो
उसके
गले
यूँँ
लगा
- Lalit Mohan Joshi
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तन्हाई
ये
तंज
करे
है
तन्हा
क्यूँ
है
यार
कहाँ
है
आगे
पीछे
चलने
वाले
Vishal Singh Tabish
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बस
एक
ही
दोस्त
है
दुनिया
में
अपना
मगर
उस
से
भी
झगड़ा
चल
रहा
है
Zubair Ali Tabish
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मकाँ
तो
है
नहीं
जो
खींच
दें
दीवार
इस
दिल
में
कोई
दूजा
नहीं
रह
पाएगा
अब
यार
इस
दिल
में
जहाँ
भर
में
लुटाते
फिर
रहे
है
कम
नहीं
होता
तुम्हारे
वास्ते
इतना
रखा
था
प्यार
इस
दिल
में
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Bhaskar Shukla
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फ़ुज़ूल-ख़र्ची
नहीं
करेंगे
Rehman Faris
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यूँँ
तो
सर्कस
में
हम
बहुत
ख़ुश
हैं
फिर
भी
जंगल
तो
यार
जंगल
था
Harman Dinesh
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लंबा
हिज्र
गुज़ारा
तब
ये
मिलने
के
पल
चार
मिले
जैसे
एक
बड़े
हफ़्ते
में
छोटा
सा
इतवार
मिले
माना
थोड़ा
मुश्किल
है
पर
रोज़
दु'आ
में
माँगा
है
जो
मुझ
सेे
भी
ज़्यादा
चाहे
तुझको
ऐसा
यार
मिले
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Bhaskar Shukla
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इश्क़
में
पागल
हो
जाना
भी
फ़न
है
दोस्त
और
ये
दुख
की
बात
है
हम
फ़नकार
नहीं
Praveen Sharma SHAJAR
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वो
हिंदू,
मैं
मुस्लिम,
ये
सिक्ख,
वो
ईसाई
यार
ये
सब
सियासत
है
चलो
इश्क़
करें
Rahat Indori
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उसको
जो
कुछ
भी
कहूँ
अच्छा
बुरा
कुछ
न
करे
यार
मेरा
है
मगर
काम
मेरा
कुछ
न
करे
दूसरी
बार
भी
पड़
जाए
अगर
कुछ
करना
आदमी
पहली
मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
न
करे
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Abid Malik
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इस
से
पहले
कि
बे-वफ़ा
हो
जाएँ
क्यूँँ
न
ऐ
दोस्त
हम
जुदा
हो
जाएँ
Ahmad Faraz
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ज़बाँ
मीठी
रखो
या
तल्ख़
तुम
मगर
सच
कहने
की
आदत
रखो
Lalit Mohan Joshi
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चलो
घर
को
अपने
अँधेरा
हुआ
है
मेरे
ख़्वाब
का
यूँँ
तमाशा
हुआ
है
यहाँ
ज़ख़्म
कितना
ये
गहरा
हुआ
है
सो
इक
शख़्स
ख़ुद
से
ही
हारा
हुआ
है
कभी
दिल
का
जैसे
वही
था
सहारा
वही
देखो
फिर
आज
बदला
हुआ
है
उसे
ढूँढता
था
मैं
जिस
आइने
में
वही
जाने
क्यूँ
आज
धुँधला
हुआ
है
ज़माना
हुआ
इश्क़
की
बात
भूले
मगर
इश्क़
कैसे
दुबारा
हुआ
है
मेरा
गाँव
कितना
सरल
और
प्यारा
वही
गाँव
मुझ
सेे
जो
छूटा
हुआ
है
वो
बचपन
की
गलियाँ
मैं
चाहूँ
भटकना
मगर
अब
वो
बचपन
पराया
हुआ
है
अमावस
में
खोजा
गया
चाँद
लेकिन
फ़क़त
मेरा
रोकर
गुज़ारा
हुआ
है
समझता
है
ख़ुद
को
जो
आगे
'ललित'
से
'ललित'
का
उसी
से
किनारा
हुआ
है
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Lalit Mohan Joshi
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हिज्र
के
दिन
कट
रहे
हैं
हिस्सों
में
हम
घट
रहे
हैं
देखकर
ये
आइना
क्यूँँ
सबके
ग़म
अब
छट
रहे
हैं
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Lalit Mohan Joshi
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शाम
मेरी
बहुत
ही
परेशान
है
आँख
ये
देखकर
यार
हैरान
है
रात
कटती
ये
तो
हिज्र
में
उसके
फिर
क्या
कोई
बचने
का
इस
सेे
इम्कान
है
आइना
सच
दिखाता
रहा
अपनों
का
दिल
मगर
मुझ
में
ही
एक
मेहमान
है
इन
दरख़्तों
को
क्यूँँ
सब
भला
काटते
कट
गए
तो
हमारा
ही
नुक़सान
है
राब्ता
हो
गया
बे-वफ़ा
से
मेरा
ये
मगर
रास्ता
यार
सुनसान
है
झोपड़ी
छोड़
मैं
शहर
को
आ
गया
कैसे
चेहरे
पे
झूठी
ये
मुस्कान
है
वो
किनारा
नदी
का
मेरे
गाँव
में
शहर
में
दर्द
का
फिर
से
ऐलान
है
शहर
भर
रौशनी
ले
के
आया
मगर
अब
'ललित'
उम्र
भर
फिर
पशेमान
है
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Lalit Mohan Joshi
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बात
को
दिल
में
दबाए
रखता
हूँ
ऐसे
मैं
ख़ुद
को
सताए
रखता
हूँ
सब्ज़
क्यूँ
करते
हो
ज़ख़्मों
को
मेरे
जब
उन्हें
मैं
ही
छुपाए
रखता
हूँ
ज़िंदगी
की
कश्ती
यूँँ
चलती
है
अब
राब्ता
ग़म
से
बनाए
रखता
हूँ
क्या
तुम्हें
मालूम
हैं
ख़ुद
को
फ़क़त
उसके
अबरू
से
बचाए
रखता
हूँ
कर
ली
है
फूलों
ने
मुझ
सेे
दूरियाँ
चाँद
को
जबसे
रिझाए
रखता
हूँ
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Lalit Mohan Joshi
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