shaam meri bahut hi pareshaan hai | शाम मेरी बहुत ही परेशान है

  - Lalit Mohan Joshi
शाममेरीबहुतहीपरेशानहै
आँखयेदेखकरयारहैरानहै
रातकटतीयेतोहिज्रमेंउसकेफिर
क्याकोईबचनेकाइससेेइम्कानहै
आइनासचदिखातारहाअपनोंका
दिलमगरमुझ
मेंहीएकमेहमानहै
इनदरख़्तोंकोक्यूँँसबभलाकाटते
कटगएतोहमाराहीनुक़सानहै
राब्ताहोगयाबे-वफ़ासेमेरा
येमगररास्तायारसुनसानहै
झोपड़ीछोड़मैंशहरकोगया
कैसेचेहरेपेझूठीयेमुस्कानहै
वोकिनारानदीकामेरेगाँवमें
शहरमेंदर्दकाफिरसेऐलानहै
शहरभररौशनीलेकेआयामगर
अब'ललित'उम्रभरफिरपशेमानहै
  - Lalit Mohan Joshi
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