chalo ghar ko apne andhera hua hai | चलो घर को अपने अँधेरा हुआ है

  - Lalit Mohan Joshi
चलोघरकोअपनेअँधेराहुआहै
मेरेख़्वाबकायूँँतमाशाहुआहै
यहाँज़ख़्मकितनायेगहराहुआहै
सोइकशख़्सख़ुदसेहीहाराहुआहै
कभीदिलकाजैसेवहीथासहारा
वहीदेखोफिरआजबदलाहुआहै
उसेढूँढताथामैंजिसआइनेमें
वहीजानेक्यूँआजधुँधलाहुआहै
ज़मानाहुआइश्क़कीबातभूले
मगरइश्क़कैसेदुबाराहुआहै
मेरागाँवकितनासरलऔरप्यारा
वहीगाँवमुझसेेजोछूटाहुआहै
वोबचपनकीगलियाँमैंचाहूँभटकना
मगरअबवोबचपनपरायाहुआहै
अमावसमेंखोजागयाचाँदलेकिन
फ़क़तमेरारोकरगुज़ाराहुआहै
समझताहैख़ुदकोजोआगे'ललित'से
'ललित'काउसीसेकिनाराहुआहै
  - Lalit Mohan Joshi
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